09 अक्टूबर : पुण्यतिथि पर विशेष :-
भारतीय राजनीति और सामाजिक परिवर्तन के इतिहास में मान्यवर कांशीराम का नाम एक ऐसे जननायक के रूप में दर्ज है, जिन्होंने सदियों से सामाजिक भेदभाव, असमानता और राजनीतिक उपेक्षा का सामना कर रहे दलित, पिछड़े तथा शोषित समाज को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने वंचित समाज को केवल सत्ता में भागीदारी का सपना नहीं दिखाया, बल्कि उसे अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर संघर्ष करने और आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का रास्ता भी बताया। 09 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के खवासपुर गांव में हुआ था। साधारण परिवार से आने वाले कांशीराम ने शिक्षा प्राप्त करने के बाद सरकारी सेवा में कार्य किया। नौकरी के दौरान उन्हें सामाजिक भेदभाव और जातिगत असमानता की वास्तविकता को करीब से देखने का अवसर मिला। इन्हीं अनुभवों ने उनके भीतर व्यवस्था को समझने और समाज के दबे-कुचले वर्गों के लिए कुछ बड़ा करने की भावना पैदा की।
उन्होंने महसूस किया कि केवल व्यक्तिगत तरक्की से सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है। इसके लिए समाज के उस बड़े वर्ग को संगठित करना जरूरी है, जो संख्या में बड़ा होने के बावजूद राजनीतिक और सामाजिक रूप से लंबे समय तक हाशिये पर रहा। इसी विचार को उन्होंने अपने जीवन का मिशन बना लिया। कांशीराम ने शिक्षित कर्मचारियों को संगठित करने से शुरुआत की और आगे चलकर व्यापक सामाजिक आंदोलन का निर्माण किया।
उन्होंने वर्ष 1971 में बामसेफ (BAMCEF) के माध्यम से शिक्षित एवं कर्मचारी वर्ग को संगठित करने का प्रयास किया। इसके बाद डीएस-4 (दलित शोषित समाज संघर्ष समिति) के जरिए सामाजिक और राजनीतिक चेतना को जन-जन तक पहुंचाने का अभियान तेज किया। उनका मानना था कि समाज के वंचित वर्गों को अपनी ताकत पहचाननी होगी और अपने अधिकारों के लिए स्वयं नेतृत्व खड़ा करना होगा।
कांशीराम के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने दलित और वंचित समाज में आत्मविश्वास पैदा किया। उन्होंने लोगों से कहा कि वे स्वयं को कमजोर या किसी के रहमोकरम पर निर्भर समझने के बजाय अपने अधिकारों और राजनीतिक शक्ति को पहचानें। उनका जोर इस बात पर था कि लोकतंत्र में केवल वोट देना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सत्ता और नीति-निर्धारण में हिस्सेदारी भी जरूरी है।
इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की। पार्टी का उद्देश्य उन सामाजिक समूहों को राजनीतिक रूप से एकजुट करना था, जिन्हें लंबे समय तक सत्ता की मुख्यधारा से दूर रखा गया। कांशीराम ने राजनीति को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया और बहुजन समाज को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए संगठित किया।
कांशीराम का राजनीतिक दर्शन केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं था। वे सत्ता को सामाजिक बदलाव का साधन मानते थे। उनका मानना था कि जब तक समाज के वंचित वर्ग निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रभावी भूमिका नहीं निभाएंगे, तब तक वास्तविक सामाजिक समानता स्थापित करना कठिन होगा। उन्होंने बहुजन समाज को शिक्षा, संगठन और राजनीतिक भागीदारी के महत्व को समझाने का लगातार प्रयास किया।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांशीराम के आंदोलन का प्रभाव विशेष रूप से दिखाई दिया। उन्होंने गांव-गांव जाकर कार्यकर्ताओं को तैयार किया और सामाजिक रूप से पिछड़े तथा वंचित वर्गों में राजनीतिक चेतना पैदा की। उनके प्रयासों से बहुजन समाज की राजनीति को एक मजबूत मंच मिला। आगे चलकर उत्तर प्रदेश में बसपा एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरी और दलित समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना।
कांशीराम का व्यक्तित्व बेहद अनुशासित और संघर्षशील था। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन सामाजिक आंदोलन को खड़ा करने और संगठन को मजबूत बनाने में लगा दिया। उनका मानना था कि परिवर्तन किसी एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं, बल्कि संगठित समाज की सामूहिक शक्ति से आता है। यही कारण है कि उन्होंने कार्यकर्ताओं को आंदोलन की रीढ़ माना और संगठन निर्माण पर विशेष जोर दिया।
उन्होंने दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और अन्य वंचित समुदायों के बीच यह भावना मजबूत की कि लोकतंत्र में उनकी संख्या ही नहीं, बल्कि उनकी संगठित राजनीतिक चेतना भी उनकी ताकत है। कांशीराम ने सामाजिक सम्मान को राजनीतिक अधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि सत्ता में भागीदारी के बिना सामाजिक परिवर्तन अधूरा रह जाता है।
उनकी राजनीति और विचारधारा को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने भारतीय लोकतंत्र में वंचित समाज की राजनीतिक भागीदारी को नई दिशा दी। उन्होंने उस दौर में एक ऐसे सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन को आकार दिया, जिसने देश की राजनीति में प्रतिनिधित्व, सामाजिक न्याय और बहुजन भागीदारी जैसे मुद्दों को मजबूती से स्थापित किया।
09 अक्टूबर 2006 को कांशीराम का निधन हुआ। उनके जाने के बाद भी उनके विचार और उनके द्वारा खड़ा किया गया सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन निरंतर चर्चा में रहा। उनकी पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और विचारों को समझने का दिन भी है।
आज जब देश सामाजिक समानता, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक भागीदारी जैसे विषयों पर लगातार आगे बढ़ रहा है, तब कांशीराम के संघर्ष को याद करना प्रासंगिक हो जाता है। उन्होंने वंचित समाज को यह संदेश दिया कि स्वाभिमान किसी से मांगने की वस्तु नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और सामूहिक एकता के बल पर हासिल किया जाने वाला सम्मान है।
मान्यवर कांशीराम ने अपने जीवन से यह साबित किया कि यदि समाज का उपेक्षित वर्ग संगठित होकर अपनी शक्ति को पहचान ले तो वह सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। उनकी पुण्यतिथि पर ऐसे जननायक को विनम्र श्रद्धांजलि, जिन्होंने शोषित और वंचित समाज को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने, संगठित होने और स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।
पंडित विजेंद्र शर्मा ✍️बलिया (उ.प्र.)


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