राष्ट्रीय अस्मिता के गीतकार - कवि प्रदीप


6 फरवरी-जन्मदिवस पर विशेष :-

"ऐ मेरे वतन के लोगों, जरा आँख में भर लो पानी, 

जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी" 

जैसे कालजयी देशभक्ति गीत के रचयिता कवि प्रदीप (मूल नाम-रामचन्द्र नारायण द्विवेदी) का जन्म उज्जैन (मध्य प्रदेश) के बड़नगर में 6 फरवरी 1915 को हुआ था। उन्होंने 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि स्वरूप उक्त गीत की रचना की थी। 26 जनवरी 1963 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में जब स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने इस भावप्रधान गीत को गाया तब नेहरु जी की भी आँखे भर आईं। आज भी जब हिन्दुस्तान की सेना की बात होती है या राष्ट्रीय त्योहारों पर यह गीत बजाया जाता है, तब राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत यह गीत हर हिन्दुस्तानी के नस-नस में राष्ट्रभक्ति का जज्बा पैदा कर देता है।

फ़िल्मी जगत में पूरी तरह आने से पहले

कवि प्रदीप लखनऊ की साहित्यिक गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों और सांस्कृतिक मंचों पर नियमित रूप से अपनी रचनाएँ सुनाते थे। लखनऊ की नफ़ासत, तहज़ीब और काव्य-परंपरा उनकी गीतात्मकता को सूक्ष्म रूप से समृद्ध करती रही। यहीं उनकी देशभक्ति, नैतिक चेतना और जनभावना से भरी कविता को पहली बार बड़ी सराहना मिली। लखनऊ की यह स्वीकृति उनके आत्मविश्वास का आधार बनी।

1940–50 के दशक में वे कई बार

आकाशवाणी लखनऊ केंद्र पर आमंत्रित हुए। उनकी प्रभावशाली आवाज़ और स्पष्ट संवेदना ने उन्हें पूरे उत्तर भारत के श्रोताओं से जोड़ दिया। लखनऊ का यह रेडियो-मंच उनके शुरुआती प्रसार का मुख्य स्तम्भ बना।

लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे शिक्षण क्षेत्र में जाने का प्रयास करने लगे। उन्हीं दिनों एक कवि सम्मेलन में उन्हें बम्बई (मुंबई) जाने का अवसर मिला। उनकी कविताओं से प्रभावित होकर मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक हिमांशु राय ने उन्हें अपने यहां दो सौ रूपए की नौकरी पर रख लिया और फिल्म 'कंगन' में गीत लिखने का काम दिया। अपने लम्बे नाम को छोटा कर उन्हें प्रदीप रखना पड़ा। चूंकि उस समय प्रदीप नाम के एक अभिनेता भी थे इसलिए वे अपने नाम के आगे कवि लगाकर 'कवि प्रदीप' बन गए।

इसके बाद फिल्मी सफर में उन्होंने अंजान, किस्मत, झूला, नया संसार, पुनर्मिलन, मशाल, नास्तिक, जागृति, पैगाम, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, जय संतोषी माता, स्कूल मास्टर आदि अनेक फिल्मों के गीत लिखे। 1940 में स्वतंत्रता आन्दोलन जब चरम पर था तब महात्मा गांधी की विचारधारा से प्रभावित होने के कारण उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में अहम योगदान दिया।

कवि प्रदीप की पहचान 1940 में रिलीज हुई फिल्म बंधन से बनी। 1943 की स्वर्ण जयंती हिट फिल्म किस्मत के गीत "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" ने उन्हें देशभक्ति गीत के रचनाकारों में अमर कर दिया। इसी गीत से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया। तब वे भूमिगत हो गए।

उनकी काव्य-शैली में असाधारण सरलता लेकिन गहन प्रभाव की झलक मिलती है।

राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक संदेश, नैतिकता और मानवीय करुणा मुख्य स्वर लिए हुए उनकी कविताएं सीधे दिल में उतरने वाली थीं। उनकी भाषा में लखनऊ की सहजता और भारतीय जनमानस की बोलचाल का अद्भुत संगम था।

उनके गीतों में समाजिक न्याय, प्रेम, सद्भाव, एकजुटता के साथ रूढ़िवादी परम्पराओं के प्रति विद्रोह पैदा करने का संदेश मिलता है। गंगा-जमुनी तहज़ीब से लोगों का परिचय कराती है उनकी कविताएं। उनकी रचनाओं से प्रभावित होकर महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला ने कहा था- "आज जितने कवियों का प्रकाश हिन्दी जगत में फैला हुआ है, उनमें प्रदीप का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल और स्निग्ध है।"

कवि प्रदीप के गीतों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके कुछ गीतों को दूसरे देशों ने चुराकर उसे अपने वतन की आजादी और देशभक्ति गीतों के रूप में अपने ढंग से प्रस्तुत कर दिया। 

पांच दशक के अपने पेशे में कवि प्रदीप ने 71 फिल्मों के लिए 1700 गीत लिखे। उनके देशभक्ति गीतों में, फिल्म बंधन (1940) में "चल चल रे नौजवान", फिल्म जागृति (1954) में "आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं", "दे दी हमें आजादी बिना खडग ढाल" और फिल्म जय संतोषी मां (1975) में "यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां-कहां" आदि प्रमुख है। इस गीत को उन्होंने फिल्म के लिए स्वयं गाया भी था।

यूँ तो कवि प्रदीप ने प्रेम के हर रूप और हर रस को शब्दों में उतारा है लेकिन उनके वीर रस और देशभक्तिपरक गीतों की बात ही कुछ अनोखी है। उन्होंने अपने कुछ गीतों को स्वयं अपनी आवाज में भी प्रस्तुत किया। गीतकारों में उनकी पहचान “जनकवि” की रही। निःसंदेह उन्हें आम आदमी की भाषा का विलक्षण कवि माना जाता था।

उन्हें 1961 में साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा 1997-98 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 2011 में भारत सरकार ने कवि प्रदीप के सम्मान में उनके चित्र और अमर गीत 'ऐ मेरे वतन के लोगों' के साथ डाक टिकट जारी किया।

11 दिसम्बर 1998 को इस महान कवि ने मुंबई के अस्पताल में कैंसर की बीमारी से जंग लड़ते हुए संसार को अलविदा कह दिया और अमर हो गए सदा के लिए।


विनोद प्रसाद ✍️

सरस्वती विहार, अम्बेडकर पथ, 

पो.- बी.भी.काॅलेज, पटना-800014 (बिहार)




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