यूजीसी प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, स्वायत्तता व गुणवत्ता के संतुलन पर दिया जोर


नई दिल्ली/बलिया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में लागू किए जा रहे नए शैक्षणिक प्रावधानों को लेकर देशभर में चल रही बहस अब न्यायपालिका के दरवाज़े तक पहुँच चुकी है। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले पर गंभीर रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार तथा यूजीसी से विस्तृत जवाब तलब किया है और यह स्पष्ट संकेत दिया है कि उच्च शिक्षा से जुड़े किसी भी नीतिगत निर्णय में शैक्षणिक गुणवत्ता के साथ-साथ विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का संरक्षण भी समान रूप से आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को शिक्षा जगत में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि शिक्षा केवल प्रशासनिक या नियामकीय विषय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र के बौद्धिक, सामाजिक और आर्थिक भविष्य से सीधा जुड़ा हुआ संवेदनशील क्षेत्र है। इसलिए नीतियों का निर्धारण करते समय संस्थानों की स्वतंत्र सोच, शोध की मौलिकता, नवाचार की क्षमता तथा क्षेत्रीय और स्थानीय आवश्यकताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि किसी भी सुधार का उद्देश्य संस्थानों पर नियंत्रण स्थापित करना नहीं, बल्कि उन्हें सशक्त बनाना, मार्गदर्शन देना और प्रतिस्पर्धात्मक वैश्विक परिवेश के अनुरूप सक्षम बनाना होना चाहिए। न्यायालय की इस टिप्पणी को उच्च शिक्षा के ढांचे में संतुलित सुधार की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।

यूजीसी के नए प्रावधानों को लेकर देशभर के शिक्षाविदों, शोधार्थियों, छात्रों तथा विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच पहले से ही व्यापक बहस चल रही है। एक पक्ष का मानना है कि ये प्रावधान शैक्षणिक गुणवत्ता को सुदृढ़ करने, शोध कार्य की विश्वसनीयता बढ़ाने, पाठ्यक्रमों के मानकीकरण तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय विश्वविद्यालयों की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत करने की दिशा में आवश्यक कदम हैं। वहीं दूसरा पक्ष यह तर्क दे रहा है कि अत्यधिक केंद्रीकरण और कठोर नियमन संस्थागत स्वतंत्रता, अकादमिक प्रयोगधर्मिता तथा स्थानीय जरूरतों के अनुरूप निर्णय लेने की क्षमता को सीमित कर सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उच्च शिक्षा नीति निर्माण के लिए एक दिशा-निर्देशक सिद्ध हो सकती है। 

इससे नीति निर्माण की प्रक्रिया में पारदर्शिता, व्यापक संवाद, शिक्षण संस्थानों की भागीदारी और सहमति आधारित निर्णयों की संभावना बढ़ेगी। साथ ही यह भी अपेक्षा की जा रही है कि भविष्य में बनने वाली नीतियाँ केवल कागज़ी सुधार तक सीमित न रहकर व्यवहारिक, समन्वित और दीर्घकालिक दृष्टि से प्रभावी होंगी।

शिक्षा जगत के कई वरिष्ठ अध्यापकों का मानना है कि गुणवत्ता और स्वायत्तता परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक तत्व हैं। यदि संस्थानों को पर्याप्त स्वतंत्रता दी जाए और साथ ही गुणवत्ता के स्पष्ट मानक निर्धारित किए जाएँ, तो उच्च शिक्षा का स्तर स्वतः सुदृढ़ हो सकता है। न्यायालय के हस्तक्षेप ने इस बहस को एक नई गंभीरता प्रदान की है और यह संदेश भी दिया है कि शिक्षा नीति केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि राष्ट्रीय दायित्व का विषय है।

अब समूचे देश की निगाहें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ यह स्पष्ट होगा कि सुधार और स्वायत्तता के बीच संतुलन की रेखा किस प्रकार निर्धारित की जाएगी। इस घटनाक्रम ने यह उम्मीद जगाई है कि भविष्य की उच्च शिक्षा नीतियाँ अधिक समावेशी, संवादपरक, व्यवहारिक तथा संस्थानों के आत्मसम्मान और अकादमिक स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने वाली होंगी।

धीरेन्द्र प्रताप सिंह✍️

*सहतवार, बलिया*



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