हरतालिका तीज : अटूट दांपत्य प्रेम, आस्था और सौभाग्य का पावन पर्व


*मेहंदी, सोलह श्रृंगार, तीज गीत और झूलों से सजता है पर्व का उल्लासपूर्ण वातावरण*

हरतालिका तीज हिंदू धर्म में विशेष आस्था, श्रद्धा और दांपत्य प्रेम का पर्व माना जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान शिव और माता पार्वती के पावन मिलन तथा माता पार्वती की कठोर तपस्या की स्मृति में मनाया जाता है। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख-शांति, प्रेम और सौभाग्य बना रहता है। अविवाहित कन्याएं भी मनचाहे वर की प्राप्ति और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से यह व्रत करती हैं।

हरतालिका तीज की कथा माता पार्वती की अटूट तपस्या और दृढ़ संकल्प से जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपनी साधना नहीं छोड़ी। माता पार्वती के इसी दृढ़ संकल्प और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। इसी पौराणिक प्रसंग की स्मृति में हरतालिका तीज का व्रत श्रद्धा के साथ किया जाता है।

‘हरतालिका’ शब्द भी अपने आप में इस पर्व की कथा को समेटे हुए है। मान्यता है कि माता पार्वती की सखी उन्हें उनके पिता के घर से वन में ले गई थीं, ताकि वे अपनी इच्छा के अनुसार भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या कर सकें। इसी कारण इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा। यह पर्व नारी के प्रेम, समर्पण, आत्मविश्वास और अपने संकल्प के प्रति दृढ़ रहने का भी संदेश देता है।

हरतालिका तीज के दिन महिलाएं प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेती हैं। अनेक महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और पूरे दिन भगवान शिव एवं माता पार्वती की आराधना करती हैं। घरों और मंदिरों में भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की पूजा की जाती है। महिलाएं सुहाग की सामग्री, वस्त्र, आभूषण और अन्य पूजन सामग्री अर्पित कर अपने पति की दीर्घायु तथा परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। शाम के समय विधि-विधान से पूजा और हरतालिका तीज की कथा का श्रवण किया जाता है।

इस पर्व की एक खास पहचान तीज के पारंपरिक श्रृंगार और लोक संस्कृति में भी देखने को मिलती है। महिलाएं नए वस्त्र पहनती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं, सोलह श्रृंगार करती हैं और एक-दूसरे को तीज की शुभकामनाएं देती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में तीज गीत गाती हैं और लोक परंपराओं का आनंद लेती हैं। झूले, लोकगीत और पारंपरिक पकवान इस पर्व की खुशियों को और बढ़ा देते हैं। आधुनिक समय में भी हरतालिका तीज ने अपनी पारंपरिक पहचान को काफी हद तक बनाए रखा है।

हरतालिका तीज केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में नारी की आस्था, त्याग और संकल्प की शक्ति को भी दर्शाता है। माता पार्वती का चरित्र महिलाओं को यह संदेश देता है कि जीवन में सच्चे उद्देश्य के लिए धैर्य, विश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति आवश्यक है। भगवान शिव और माता पार्वती का दांपत्य जीवन प्रेम, समानता, विश्वास और पारस्परिक सम्मान का प्रतीक माना जाता है।

आज के बदलते दौर में त्योहारों का स्वरूप भले ही बदल रहा हो, लेकिन उनके मूल संस्कार और भावनाएं अब भी समाज को जोड़ने का काम करती हैं। हरतालिका तीज परिवार में प्रेम और आपसी विश्वास बढ़ाने के साथ-साथ हमारी लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी प्रदान करती है। इस अवसर पर हमें पर्व की धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ प्रकृति, परिवार और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी समझना चाहिए।

हरतालिका तीज का पावन पर्व यही संदेश देता है कि सच्चे प्रेम की नींव विश्वास, त्याग और समर्पण पर टिकी होती है। भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करते हुए मनुष्य अपने जीवन में सुख, शांति और सद्भाव की कामना करता है। यह पर्व हर परिवार में खुशियां, प्रेम और समृद्धि लेकर आए तथा सभी के जीवन में विश्वास और सौहार्द की भावना मजबूत हो—इसी मंगलकामना के साथ हरतालिका तीज की हार्दिक शुभकामनाएं।

सुधा सिंह ✍️

नसीरपुर कलां, बलिया (उ.प्र.)