भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जयंती विशेष : आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक ने जगाई भाषा, साहित्य और समाज में नवचेतना


भाषा, साहित्य और समाज सुधार के पुरोधा भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की जयंती पर विशेष

वाराणसी। हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाम ऐसे युगद्रष्टा साहित्यकार के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य को नई दिशा देने के साथ समाज में जागरण और नवचेतना का संचार किया। आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक कहे जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की जयंती पर साहित्य जगत उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण करता है। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों को जनता के सामने रखा तथा समाज को रूढ़ियों, अंधविश्वासों और कुरीतियों से बाहर निकलने का संदेश दिया।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को वाराणसी में हुआ था। अल्पायु में ही उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में ऐसी अमिट छाप छोड़ी, जिसने हिंदी के आधुनिक युग की आधारशिला मजबूत की। कविता, नाटक, निबंध, पत्रकारिता और गद्य लेखन के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत व्यापक रहा। उनकी रचनाओं में देशप्रेम, सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और तत्कालीन व्यवस्था के प्रति सजग दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है।

भारतेन्दु ने हिंदी को केवल साहित्य की भाषा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जनजागरण और समाज परिवर्तन का माध्यम बनाया। उनका प्रसिद्ध कथन “निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल” हिंदी भाषा के प्रति उनके गहरे लगाव और मातृभाषा के महत्व को दर्शाता है। उनका मानना था कि किसी भी समाज और राष्ट्र की वास्तविक प्रगति उसकी अपनी भाषा और संस्कृति के विकास से जुड़ी होती है।

साहित्य के माध्यम से समाज की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करने में भी भारतेन्दु का योगदान अद्वितीय रहा। उनकी प्रसिद्ध नाटक कृति ‘अंधेर नगरी’ आज भी व्यवस्था की विसंगतियों और राजनीतिक-सामाजिक विडंबनाओं पर करारा व्यंग्य मानी जाती है। वहीं ‘भारत दुर्दशा’ में उन्होंने देश की तत्कालीन स्थिति और जनता की पीड़ा को प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया। उनकी रचनाओं में राष्ट्रप्रेम की भावना के साथ समाज को जागरूक और आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा भी दिखाई देती है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने पत्रकारिता को भी सामाजिक जागरण का सशक्त माध्यम बनाया। उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं के जरिए जनता को समसामयिक विषयों से जोड़ने और सामाजिक चेतना पैदा करने का कार्य किया। हिंदी गद्य को सरल, प्रभावशाली और जनसामान्य के करीब लाने में उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। इसी कारण हिंदी साहित्य के आधुनिक युग का प्रारंभ भारतेन्दु युग से माना जाता है।

महान समाजसुधारक के रूप में भारतेन्दु ने सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास, अशिक्षा और रूढ़िवादिता के खिलाफ अपनी लेखनी को हथियार बनाया। उन्होंने समाज में शिक्षा, जागरूकता और सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका साहित्य आज भी यह संदेश देता है कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने और नई चेतना पैदा करने की शक्ति भी है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जीवन भले ही अल्प रहा, लेकिन साहित्य और समाज के लिए उनका योगदान युगों तक याद किया जाएगा। उन्होंने हिंदी भाषा को नई पहचान दी, साहित्य को सामाजिक सरोकारों से जोड़ा और देशवासियों में आत्मसम्मान तथा राष्ट्रीय चेतना की भावना को मजबूत किया। उनकी जयंती केवल एक महान साहित्यकार को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि अपनी भाषा, संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक होने का भी दिन है।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की लेखनी से निकली नवचेतना आज भी हिंदी साहित्य और समाज को प्रेरित करती है। हिंदी भाषा के उत्थान, साहित्य की समृद्धि और सामाजिक जागरण के लिए उनका योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा।

आशीष त्रिवेदी ✍️

सचिव, संकल्प संस्था, बलिया