पुरुषोत्तम मास : भक्ति, साधना और आत्मशुद्धि का पावन अवसर


सनातन धर्म में पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व माना गया है। इसे अधिक मास या मलमास के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से यह अत्यंत पुण्यदायी और भगवान विष्णु को समर्पित महीना माना गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार जब किसी चंद्र मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती, तब वह मास अधिक मास कहलाता है। लगभग प्रत्येक 32 महीने 16 दिन के अंतराल पर यह मास आता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि अन्य महीनों की अपेक्षा पुरुषोत्तम मास में किए गए जप, तप, दान, व्रत, पूजा-पाठ और सत्कर्मों का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है।

पुराणों के अनुसार प्रारंभ में अधिक मास को कोई महत्व प्राप्त नहीं था। सभी महीनों ने उसे तिरस्कृत कर दिया था, तब वह दुखी होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचा। भगवान विष्णु ने उसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” प्रदान किया और कहा कि यह मास अब सबसे श्रेष्ठ और पुण्य देने वाला होगा। तभी से इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा। यह महीना भगवान श्रीहरि विष्णु की कृपा प्राप्त करने का उत्तम समय माना जाता है।

पुरुषोत्तम मास आत्मशुद्धि, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर प्रदान करता है। इस दौरान श्रद्धालु प्रातःकाल स्नान कर भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और तुलसी जी की पूजा करते हैं। मंदिरों में भजन-कीर्तन, कथा, रामायण पाठ, श्रीमद्भागवत कथा तथा गीता पाठ का आयोजन किया जाता है। लोग सात्विक जीवन अपनाते हैं तथा क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी बुराइयों से दूर रहने का प्रयास करते हैं। यह महीना मन, वचन और कर्म की पवित्रता का संदेश देता है।

धार्मिक मान्यता है कि पुरुषोत्तम मास में दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। गरीबों को अन्न, वस्त्र, जल, फल तथा जरूरतमंदों की सहायता करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। गौसेवा, तुलसी सेवा और ब्राह्मण भोजन कराने को भी अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। इस मास में किए गए छोटे-छोटे सत्कर्म भी मनुष्य के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं।

पुरुषोत्तम मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन को बेहतर बनाने का संदेश भी देता है। यह हमें सादगी, सेवा, करुणा और आत्मनिरीक्षण की प्रेरणा देता है। आज की भागदौड़ और तनावपूर्ण जीवनशैली में यह महीना मानसिक शांति और आत्मिक संतुलन प्राप्त करने का श्रेष्ठ माध्यम बन सकता है। यदि व्यक्ति इस अवधि में अपने व्यवहार और विचारों को शुद्ध करने का प्रयास करे, तो उसका जीवन अधिक सुखी और संतुलित बन सकता है।

इस मास में विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते, क्योंकि इसे भक्ति और साधना के लिए समर्पित माना गया है। श्रद्धालु इस पूरे महीने व्रत रखकर, नियमपूर्वक पूजा-अर्चना कर और प्रभु स्मरण करते हुए अपना समय व्यतीत करते हैं। मान्यता है कि पुरुषोत्तम मास में सच्चे मन से भगवान विष्णु की आराधना करने से सभी दुखों का नाश होता है और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि आती है।

पुरुषोत्तम मास हमें यह सीख देता है कि जीवन में आध्यात्मिकता और नैतिकता का कितना महत्व है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मजागरण और मानवता की सेवा का संदेश देने वाला पावन काल है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को इस महीने का सदुपयोग करते हुए भक्ति, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।

पंडित संतोष कुमार दूबे 

गोपालपुर, सहोदरा 

जिला - बलिया (उ.प्र.)

मो0 - 79059 16135



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