(01 फरवरी - गुरु रविदास जयंती विशेष)
भारत की संत परंपरा में गुरु रविदास जी का नाम सामाजिक चेतना, आध्यात्मिक ऊँचाई और मानवीय समानता के प्रखर प्रतीक के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। प्रत्येक वर्ष 01 फरवरी को श्रद्धा, सम्मान और आत्ममंथन के भाव के साथ मनाई जाने वाली गुरु रविदास जयंती केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समता और भाईचारे के विचारों को पुनः जीवित करने का पर्व है। गुरु रविदास जी ने अपने विचारों और कर्मों से उस समाज को नई दिशा दी, जो जाति, भेदभाव और असमानता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था।
गुरु रविदास जी का जन्म 15वीं शताब्दी में काशी (वर्तमान वाराणसी) के निकट हुआ माना जाता है। वे जन्म से ही साधारण परिवार से थे, किंतु उनकी चेतना और चिंतन असाधारण था। उन्होंने जीवन भर यह संदेश दिया कि मनुष्य की पहचान उसके कर्म, विचार और चरित्र से होती है, न कि जन्म या जाति से। उनके लिए ईश्वर मंदिरों या मूर्तियों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह हर उस हृदय में बसता है, जहाँ प्रेम, सत्य और करुणा का वास हो।
गुरु रविदास जी एक महान संत ही नहीं, बल्कि गहरे दार्शनिक भी थे। उनका दर्शन भक्ति, ज्ञान और सामाजिक समरसता का अद्भुत संगम है। उन्होंने निर्गुण भक्ति परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ईश्वर निराकार है और उसे पाने के लिए आडंबर नहीं, बल्कि निर्मल मन और सच्चे भाव की आवश्यकता है। उनके पदों और वाणियों में आत्मा की शुद्धता, अहंकार के त्याग और मानवीय मूल्यों की प्रधानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
उनकी प्रसिद्ध कल्पना “बेगमपुरा” एक ऐसे आदर्श समाज की अवधारणा प्रस्तुत करती है, जहाँ न कोई दुखी है, न कोई शोषित, न ऊँच-नीच है और न ही भय। यह विचार आज भी सामाजिक समानता और न्याय की दिशा में प्रेरणा देता है। गुरु रविदास जी का यह स्वप्न मात्र आध्यात्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का भी आधार है।
गुरु रविदास जी की वाणी इतनी प्रभावशाली थी कि उनके अनेक पद गुरु ग्रंथ साहिब में भी सम्मिलित किए गए हैं। यह तथ्य उनकी आध्यात्मिक ऊँचाई और सार्वभौमिक स्वीकार्यता का प्रमाण है। उनके विचारों से मीरा बाई जैसी महान भक्त भी प्रभावित हुईं, जो स्वयं उनकी शिष्या मानी जाती हैं।
01 फरवरी को मनाई जाने वाली गुरु रविदास जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब हर व्यक्ति को समान सम्मान, अवसर और अधिकार मिलें। आज के समय में, जब समाज अनेक प्रकार के विभाजन और असहिष्णुता से जूझ रहा है, गुरु रविदास जी के विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।
गुरु रविदास जी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति वही है, जो मानवता की सेवा में प्रकट हो। उनका संदेश—“मन चंगा तो कठौती में गंगा”—आज भी आत्मशुद्धि और सकारात्मक सोच का मार्गदर्शन करता है।
परिवर्तन चक्र समाचार सेवा ✍️
गुरु रविदास जयंती के पावन अवसर पर आइए, हम सभी उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लें, भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता, प्रेम और समता के मार्ग पर चलें। यही गुरु रविदास जी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


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