श्री रामलला प्राण प्रतिष्ठा की द्वितीय वर्षगांठ : आस्था, संस्कार और राष्ट्रीय चेतना का अमृत पर्व


अयोध्या धाम में श्रीराम जन्मभूमि पर श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की द्वितीय वर्षगांठ पूरे देश के लिए आस्था, गौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का पावन अवसर बनकर सामने आई। यह दिवस केवल एक धार्मिक आयोजन भर नहीं, बल्कि सदियों की प्रतीक्षा, तपस्या और संघर्ष के पश्चात प्राप्त उस ऐतिहासिक क्षण की स्मृति है, जिसने भारत की आत्मा को एक नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की। प्रभु श्रीराम, जो मर्यादा, सत्य, करुणा और कर्तव्य के प्रतीक हैं, उनके विग्रह में प्राण प्रतिष्ठा के साथ ही राष्ट्र की चेतना में भी नवप्राण का संचार हुआ।

द्वितीय वर्षगांठ के अवसर पर अयोध्या सहित देशभर के मंदिरों, तीर्थस्थलों और श्रद्धालुओं के घरों में विशेष पूजा-अर्चना, रामचरितमानस पाठ, सुंदरकांड, हवन-यज्ञ और भजन-कीर्तन का आयोजन हुआ। प्रभु श्रीराम के जयघोष से वातावरण गुंजायमान हो उठा और दीपों की ज्योति ने हर कोने को आलोकित कर दिया। श्रद्धालुओं के चेहरों पर भक्ति, विश्वास और संतोष की झलक स्पष्ट दिखाई दी, मानो यह उत्सव केवल अयोध्या तक सीमित न होकर संपूर्ण भारत की आत्मिक अनुभूति बन गया हो।

श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा भारतीय सभ्यता और संस्कृति की उस निरंतरता का प्रतीक है, जो समय, संघर्ष और परिवर्तन के बावजूद अक्षुण्ण बनी रही। यह आयोजन हमें स्मरण कराता है कि प्रभु श्रीराम केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि जीवन जीने की वह पद्धति हैं, जिसमें सत्य के साथ दृढ़ता, शक्ति के साथ करुणा और अधिकार के साथ कर्तव्य का संतुलन निहित है। आज के समय में जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब राम के आदर्श हमें संयम, समरसता और सद्भाव का मार्ग दिखाते हैं।

द्वितीय वर्षगांठ का यह पर्व युवा पीढ़ी के लिए भी प्रेरणास्रोत है। रामकथा उन्हें यह सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी धर्म, मर्यादा और नैतिक मूल्यों से विचलित हुए बिना आगे बढ़ना ही सच्ची विजय है। परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का भाव प्रभु श्रीराम के जीवन से सहज रूप में ग्रहण किया जा सकता है। यही कारण है कि राम केवल पूजा के नहीं, बल्कि आचरण के विषय हैं।

इस पावन अवसर पर यह संकल्प भी लिया गया कि हम सब अपने जीवन में रामराज्य के मूल तत्वों—न्याय, समानता, सेवा और लोककल्याण—को अपनाने का प्रयास करेंगे। जब प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों का निर्वहन ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ करेगा, तभी सच्चे अर्थों में रामराज्य की परिकल्पना साकार होगी। श्री रामलला की द्वितीय प्राण प्रतिष्ठा वर्षगांठ हमें यही संदेश देती है कि आस्था केवल भावना नहीं, बल्कि कर्म में उतरी हुई साधना है।

अंततः यह दिन भारत की सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक शक्ति का उत्सव है। अयोध्या से निकली यह ज्योति संपूर्ण राष्ट्र को आलोकित करती रहे, प्रभु श्रीराम के आदर्श हर हृदय में स्थापित हों और भारत सदैव धर्म, सत्य और मानवता के पथ पर अग्रसर रहे—इसी मंगलकामना के साथ श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की द्वितीय वर्षगांठ को कोटि-कोटि नमन।

जय श्रीराम।



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