नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती व पराक्रम दिवस : राष्ट्रस्वाभिमान, साहस और क्रांति का उद्घोष


भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 23 जनवरी का दिन स्वर्णाक्षरों में अंकित है। यह दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती के रूप में मनाया जाता है और साथ ही देश इसे पराक्रम दिवस के रूप में भी स्मरण करता है। यह अवसर केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि अर्पित करने का नहीं, बल्कि उनके अद्वितीय साहस, त्याग, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण को आत्मसात करने का संदेश देता है। नेताजी का जीवन भारतीय जनमानस के लिए पराक्रम, स्वाभिमान और संघर्ष की प्रेरणाशिला है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ। प्रारंभ से ही उनके भीतर राष्ट्रभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित थी। उन्होंने आईसीएस जैसी प्रतिष्ठित सेवा का त्याग कर देशसेवा का मार्ग चुना, जो उनके दृढ़ संकल्प और पराक्रमी व्यक्तित्व को दर्शाता है। उनका मानना था कि स्वतंत्रता केवल प्रार्थनाओं से नहीं, बल्कि संगठित संघर्ष और बलिदान से प्राप्त होती है। यही विचार उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे क्रांतिकारी और निर्भीक नेताओं की श्रेणी में स्थापित करता है।

नेताजी द्वारा गठित आजाद हिंद फौज भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक अध्याय है। “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” जैसे ओजस्वी नारे ने देशवासियों में नई चेतना और आत्मविश्वास का संचार किया। उन्होंने विदेश की धरती से भी भारत की आज़ादी की लड़ाई को संगठित कर यह सिद्ध किया कि राष्ट्रप्रेम सीमाओं का मोहताज नहीं होता। उनका पराक्रम केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके विचार, नेतृत्व क्षमता और संगठन कौशल में भी झलकता है।

पराक्रम दिवस नेताजी के उसी अदम्य साहस और राष्ट्र के प्रति निष्ठा का प्रतीक है। यह दिन देशवासियों को यह याद दिलाता है कि स्वतंत्रता के पीछे असंख्य बलिदान और संघर्ष की गाथाएँ जुड़ी हुई हैं। नेताजी का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा के लिए हर नागरिक को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग और प्रतिबद्ध होना चाहिए। विशेषकर युवाओं के लिए नेताजी का जीवन अनुशासन, आत्मबल और राष्ट्रसेवा की सर्वोच्च मिसाल है।

आज के समय में, जब देश विकास के पथ पर अग्रसर है और अनेक सामाजिक, आर्थिक व वैश्विक चुनौतियों का सामना कर रहा है, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। उनका स्पष्ट संदेश था—राष्ट्र सर्वोपरि है और व्यक्तिगत स्वार्थ राष्ट्रहित के सामने गौण हैं। पराक्रम दिवस इसी भावना को जन-जन तक पहुँचाने का अवसर प्रदान करता है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती एवं पराक्रम दिवस पर देशभर में विविध कार्यक्रमों, संगोष्ठियों, रैलियों और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में उनके जीवन, विचारों और संघर्षों को स्मरण कर नई पीढ़ी को प्रेरित किया जाता है।

निस्संदेह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन राष्ट्रगौरव का अमूल्य धरोहर है। उनकी जयंती और पराक्रम दिवस हमें यह संकल्प दिलाते हैं कि हम उनके दिखाए मार्ग पर चलकर एक सशक्त, आत्मनिर्भर और स्वाभिमानी भारत के निर्माण में अपना योगदान दें। यही नेताजी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि और पराक्रम दिवस की वास्तविक सार्थकता है।

*परिवर्तन चक्र समाचार सेवा ✍️* 




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