12 अक्टूबर पुण्यतिथि विशेष : सामाजिक न्याय, गैरबराबरी के विरोध और जनहित की राजनीति के लिए सदैव याद किए जाएंगे डॉ. लोहिया
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी, प्रखर चिंतक, समाजवादी विचारधारा के प्रमुख स्तंभ और सामाजिक न्याय के प्रबल समर्थक डॉ. राममनोहर लोहिया का नाम भारतीय राजनीति के इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश की आजादी, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, सामाजिक समानता और शोषित-वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया। 12 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करता है। उनके विचार आज भी समाज और राजनीति को नई दिशा देने की क्षमता रखते हैं।
डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्म 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में हुआ था। बचपन से ही उनके भीतर देशभक्ति, सामाजिक चेतना और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस दिखाई देने लगा था। महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध संघर्ष करते हुए उन्होंने कई बार जेल की यातनाएं सहीं, लेकिन अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही। उन्होंने भूमिगत रहकर आंदोलन को गति देने में योगदान दिया और ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियों का विरोध किया।
आजादी के बाद डॉ. लोहिया ने सत्ता को लक्ष्य बनाने के बजाय समाज के अंतिम व्यक्ति तक न्याय और अधिकार पहुंचाने को अपनी राजनीति का आधार बनाया। वह मानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी, जब समाज में आर्थिक और सामाजिक असमानता समाप्त होगी। उनके समाजवाद का उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि व्यवस्था में ऐसा बदलाव लाना था, जिससे गरीबों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं, पिछड़े वर्गों और वंचित समुदायों को सम्मानजनक जीवन जीने का अवसर मिल सके। वह जातिगत भेदभाव, छुआछूत, लैंगिक असमानता और आर्थिक विषमता के प्रबल विरोधी थे।
डॉ. लोहिया ने भारतीय समाज में व्याप्त गैरबराबरी को लोकतंत्र के सामने एक बड़ी चुनौती माना। उनका विश्वास था कि समाज में जन्म, जाति, भाषा, लिंग अथवा आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने महिलाओं को समान अधिकार देने, पिछड़े वर्गों को अवसर उपलब्ध कराने और सामाजिक रूप से कमजोर लोगों को आगे बढ़ाने की वकालत की। उनका मानना था कि जब तक समाज के वंचित वर्गों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित भागीदारी नहीं मिलेगी, तब तक वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना अधूरी रहेगी।
लोहिया की राजनीति की एक प्रमुख विशेषता सत्ता से सवाल पूछने और जनहित के मुद्दों को प्राथमिकता देने का साहस था। वह सरकारों की नीतियों की आलोचना को लोकतंत्र का आवश्यक अंग मानते थे। उनके लिए विपक्ष का अर्थ केवल विरोध करना नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं को सामने लाना और सरकार को जवाबदेह बनाना था। उन्होंने महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, किसानों की समस्याओं और आम आदमी के जीवन से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाने का प्रयास किया। उनकी स्पष्टवादिता और वैचारिक दृढ़ता ने उन्हें भारतीय समाजवादी आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनाया।
डॉ. लोहिया भारतीय भाषाओं के सम्मान और अंग्रेजी के वर्चस्व को कम करने के भी समर्थक थे। वह चाहते थे कि शासन-प्रशासन, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में आम जनता की भाषाओं को उचित स्थान मिले, ताकि भाषा किसी व्यक्ति की प्रगति में बाधा न बने। उनके विचारों में राष्ट्र की एकता, सांस्कृतिक विविधता और आम नागरिक की भागीदारी का विशेष महत्व था। वह विकेंद्रीकरण के पक्षधर थे और मानते थे कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए अधिकारों तथा निर्णय लेने की शक्ति का लाभ गांवों और स्थानीय संस्थाओं तक पहुंचना चाहिए।
डॉ. राममनोहर लोहिया का जीवन इस बात का प्रमाण है कि राजनीति केवल पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का साधन भी हो सकती है। उन्होंने अपने विचारों, लेखन, आंदोलनों और सार्वजनिक जीवन के माध्यम से कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। उनके समाजवादी चिंतन ने भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय, पिछड़ों की भागीदारी और समान अवसर जैसे विषयों को व्यापक चर्चा का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
12 अक्टूबर 1967 को डॉ. राममनोहर लोहिया का निधन हो गया, लेकिन उनके विचार समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होते गए। आज जब समाज गरीबी, बेरोजगारी, असमानता, जातिगत भेदभाव और सामाजिक विभाजन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब उनके विचार हमें समानता, स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक जवाबदेही और मानवीय गरिमा के महत्व की याद दिलाते हैं। उनकी पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन और सामाजिक व्यवहार में उतारने का संकल्प लेने का दिन भी है।
डॉ. राममनोहर लोहिया का व्यक्तित्व हमें सिखाता है कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना, कमजोरों के अधिकारों की रक्षा करना और समाज में समान अवसरों की स्थापना के लिए निरंतर प्रयास करना ही सच्ची जनसेवा है। उनके विचारों की सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब समाज में भेदभाव की जगह समानता, स्वार्थ की जगह जनहित और निराशा की जगह परिवर्तन की भावना मजबूत होगी। देश के इस महान स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी चिंतक को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन।
अरविंद गिरि ✍️प्रदेश अध्यक्ष
समाजवादी युवजन सभा (उ.प्र.)


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