सप्तऋषियों के स्मरण का पर्व, आत्मशुद्धि और सदाचार का देता है संदेश
15 सितंबर। भारतीय संस्कृति में ऋषियों की परंपरा केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। उन्होंने ज्ञान, तप, साधना और चिंतन के माध्यम से समाज को जीवन के विविध क्षेत्रों में दिशा दी। भाद्रपद शुक्ल पंचमी को मनाई जाने वाली ऋषि पंचमी इसी महान परंपरा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अवसर है। इस दिन सप्तऋषियों—कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ—का स्मरण कर उनकी शिक्षाओं को जीवन में उतारने की प्रेरणा ली जाती है।
ऋषि पंचमी को आत्मशुद्धि और प्रायश्चित से जुड़ा पर्व माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत, पूजन और संयम के माध्यम से मनुष्य अपने जाने-अनजाने हुए दोषों के लिए प्रायश्चित करता है। विशेष रूप से महिलाएं श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर सप्तऋषियों और अरुंधती का पूजन करती हैं। घरों में पूजा-अर्चना के साथ ऋषियों की कथाओं और उनके जीवन से जुड़े प्रसंगों का स्मरण किया जाता है।
सप्तऋषियों का महत्व इसलिए भी विशेष है क्योंकि भारतीय परंपरा में उन्हें ज्ञान और संस्कृति के संवाहक के रूप में देखा गया है। उन्होंने कठिन तपस्या के साथ समाज को सत्य, अनुशासन, संयम, सेवा और कर्तव्य का मार्ग दिखाया। उनके चिंतन में मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन को भी महत्वपूर्ण स्थान मिला। यही कारण है कि हजारों वर्ष पुरानी ऋषि परंपरा आज भी भारतीय जीवन-दर्शन का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है।
ऋषि पंचमी का संदेश वर्तमान समय में और अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है। तेज रफ्तार जीवन, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और भौतिक सुविधाओं के बीच मनुष्य अक्सर मानसिक संतुलन और आत्मअनुशासन को पीछे छोड़ देता है। ऐसे समय में ऋषियों का जीवन यह याद दिलाता है कि वास्तविक उन्नति केवल साधनों के विस्तार में नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता और आचरण की श्रेष्ठता में भी निहित है।
इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों के साथ ऋषियों के विचारों को समझना भी आवश्यक है। गुरु और विद्वानों का सम्मान, ज्ञान की खोज, सत्य के प्रति निष्ठा, जरूरतमंदों की सहायता तथा प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी—ये ऐसे मूल्य हैं, जिन्हें अपनाकर ऋषि परंपरा को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ा जा सकता है। बच्चों और युवाओं को भी ऋषि-मुनियों के योगदान से परिचित कराने का यह उपयुक्त अवसर है।
ऋषि पंचमी का पर्व हमें अपनी परंपरा की जड़ों की ओर लौटने का अवसर देता है। यह बताता है कि भारतीय संस्कृति का निर्माण केवल राजाओं और साम्राज्यों से नहीं, बल्कि उन तपस्वी मनीषियों के चिंतन से भी हुआ, जिन्होंने ज्ञान को समाज की धरोहर बनाया। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम उनके बताए श्रेष्ठ मूल्यों को अपने व्यवहार का हिस्सा बनाएं।
सप्तऋषियों के चरणों में नमन करते हुए ऋषि पंचमी पर यही कामना है कि ज्ञान, विवेक और सदाचार की परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रहे। यह पर्व प्रत्येक व्यक्ति को आत्ममंथन, संयम और श्रेष्ठ आचरण की राह पर चलने की प्रेरणा प्रदान करे।
जितेंद्र सिंह "विकास" ✍️नसीरपुर कलां, बलिया



