माता-पिता : जीवन की पहली पाठशाला, पहला भगवान और सबसे बड़ा संबल


माता-पिता दिवस (अभिभावक दिवस) पर विशेष :-

माता-पिता केवल जन्म देने वाले नहीं होते, बल्कि वे हमारे जीवन के पहले शिक्षक, पहले मार्गदर्शक, पहले मित्र और सबसे बड़े शुभचिंतक भी होते हैं। संसार में यदि कोई रिश्ता निस्वार्थ प्रेम, त्याग, समर्पण और ममता का सबसे बड़ा उदाहरण है, तो वह माता-पिता का रिश्ता है। वे अपने बच्चों के सुखद भविष्य के लिए अपने सपनों, इच्छाओं और आराम तक का त्याग कर देते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में माता-पिता को भगवान से भी बढ़कर सम्मान दिया गया है। शास्त्रों में कहा गया है— "मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः" अर्थात माता और पिता देवतुल्य हैं।

हर वर्ष जुलाई के चौथे रविवार को माता-पिता दिवस (Parents Day/अभिभावक दिवस) मनाया जाता है। यह दिन उन सभी माता-पिता और अभिभावकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और प्रेम व्यक्त करने का अवसर है, जिन्होंने अपने बच्चों के जीवन को संवारने में अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। यह केवल एक औपचारिक दिवस नहीं, बल्कि परिवार के महत्व, संस्कारों की शक्ति और पीढ़ियों के बीच प्रेम व विश्वास को मजबूत करने का संदेश देने वाला विशेष अवसर है।

बच्चे के जीवन की पहली पाठशाला उसका घर होता है और उसके पहले शिक्षक उसके माता-पिता। बोलना, चलना, अच्छे-बुरे की पहचान करना, अनुशासन, संस्कार, ईमानदारी, मेहनत, दूसरों का सम्मान करना और जीवन की चुनौतियों का सामना करना—इन सभी गुणों की नींव माता-पिता ही रखते हैं। वे केवल शिक्षा नहीं देते, बल्कि अपने आचरण से जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं।

मां अपने वात्सल्य, ममता और अथाह प्रेम से बच्चे के जीवन को संवेदनशील बनाती है, जबकि पिता अपने संघर्ष, अनुशासन और परिश्रम से उसे आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देते हैं। मां बच्चे के आंसुओं को मुस्कान में बदल देती है और पिता हर कठिन परिस्थिति में मजबूत सहारा बनकर उसके साथ खड़े रहते हैं। दोनों मिलकर बच्चे के व्यक्तित्व को ऐसा आकार देते हैं, जो उसे जीवन में सफलता की राह पर आगे बढ़ाता है।

आज का समय आधुनिकता, व्यस्तता और तकनीक का युग है। जीवन की भागदौड़ में कई बार परिवार के लिए समय निकालना कठिन हो जाता है। संयुक्त परिवारों की जगह एकल परिवार बढ़ रहे हैं और अनेक वृद्ध माता-पिता अकेलेपन का जीवन जीने को विवश हैं। ऐसे समय में माता-पिता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि भौतिक सुख-सुविधाओं से अधिक महत्वपूर्ण अपने माता-पिता का साथ, उनका सम्मान और उनकी भावनाओं की कद्र करना है।

वृद्धावस्था में माता-पिता को सबसे अधिक आवश्यकता अपने बच्चों के समय, अपनत्व और सम्मान की होती है। उनके लिए सबसे बड़ी खुशी महंगे उपहार नहीं, बल्कि अपने बच्चों का स्नेह, सम्मान और कुछ पल साथ बिताना होता है। एक फोन कॉल, हालचाल पूछ लेना, उनके साथ बैठकर बातें करना या उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखना भी उनके चेहरे पर मुस्कान ला सकता है।

भारतीय संस्कृति में माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ा धर्म माना गया है। इतिहास और धर्मग्रंथों में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहां माता-पिता की सेवा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। श्रवण कुमार की अपने माता-पिता के प्रति सेवा और समर्पण आज भी आदर्श मानी जाती है। यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि जो अपने माता-पिता का सम्मान करता है, वह जीवन में सच्चे अर्थों में सफल और समृद्ध बनता है।

माता-पिता दिवस केवल बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए भी एक प्रेरणा है। यह दिन हमें यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हम अपने माता-पिता को पर्याप्त समय दे रहे हैं? क्या हम उनके त्याग और संघर्ष का सम्मान कर रहे हैं? क्या हम उनकी भावनाओं को समझ रहे हैं? यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक नहीं है, तो यही सही समय है अपने व्यवहार में बदलाव लाने का।

आइए, इस माता-पिता दिवस पर हम संकल्प लें कि अपने माता-पिता और अभिभावकों का सदैव सम्मान करेंगे, उनकी सेवा करेंगे, उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होने देंगे और उनके सपनों तथा उम्मीदों का सम्मान करेंगे। क्योंकि माता-पिता का आशीर्वाद ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है। उनके प्रेम, त्याग और संस्कारों से ही एक सशक्त परिवार, एक सशक्त समाज और एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण होता है।

"माता-पिता का सम्मान केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवनभर निभाया जाने वाला सबसे पवित्र कर्तव्य है। उनके चरणों में ही सच्चे सुख, सफलता और ईश्वर का आशीर्वाद बसता है।"

मोहनीश गुप्ता "मोनू" ✍️ 

समाजसेवी, बलिया (उ.प्र.)




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