अब खामोशी नहीं, गूंज रही है उम्मीद की आवाज़


*अत्याधुनिक कॉक्लियर इम्प्लांट तकनीक से श्रवण बाधित बच्चों को मिल रही नई जिंदगी, IMS-BHU बना पूर्वांचल का भरोसेमंद केंद्र*

वाराणसी। चिकित्सा विज्ञान की तेज़ी से विकसित होती तकनीकों ने आज उन बच्चों के जीवन में भी सुनहरी उम्मीद जगा दी है, जो जन्म से कभी अपने माता-पिता की आवाज़ तक नहीं सुन पाए थे। 

अत्याधुनिक कॉक्लियर इम्प्लांट (Cochlear Implant) तकनीक की बदौलत अब ऐसे बच्चे न केवल ध्वनियों को सुन रहे हैं, बल्कि बोलना सीख रहे हैं, सामान्य विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और समाज की मुख्यधारा में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहे हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (IMS-BHU) का ईएनटी विभाग इस दिशा में पूर्वांचल, बिहार, झारखंड और पड़ोसी देश नेपाल के सैकड़ों परिवारों के लिए नई उम्मीद का केंद्र बनकर उभरा है। 

ईएनटी विभाग के विभागाध्यक्ष एवं एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुशील कुमार अग्रवाल (डॉ. एस.के. अग्रवाल) बताते हैं कि कॉक्लियर इम्प्लांट केवल एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञ चिकित्सा और मानवीय संवेदनाओं का ऐसा संगम है, जो एक बच्चे के साथ पूरे परिवार की जिंदगी बदल देता है। उन्होंने भावुक होकर बताया कि जब एक तीन वर्षीय बच्चे ने पहली बार अपने पिता की आवाज़ सुनी, तो उसके चेहरे की मुस्कान और आंखों की चमक देखकर ऑपरेशन थिएटर में मौजूद पूरी चिकित्सकीय टीम भावुक हो गई। उन्होंने कहा, "वह क्षण हमारे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था। उस बच्चे की मुस्कान ने हमें यह एहसास कराया कि चिकित्सा केवल इलाज नहीं, बल्कि जीवन में खुशियां लौटाने का माध्यम भी है।" 

डॉ. अग्रवाल के अनुसार वर्तमान समय में कॉक्लियर इम्प्लांट तकनीक पहले से कहीं अधिक उन्नत और सफल हो चुकी है। हाई-रिजोल्यूशन सीटी स्कैन, एमआरआई, डिजिटल ऑडियोलॉजी, कंप्यूटर आधारित डिजिटल मैपिंग, माइक्रोस्कोपिक एवं मिनिमली इनवेसिव सर्जरी तथा ऑपरेशन के बाद अत्याधुनिक स्पीच और हियरिंग थेरेपी की मदद से बच्चों में सुनने और बोलने की क्षमता तेजी से विकसित की जा रही है। यही कारण है कि अब ऐसे अनेक बच्चे सामान्य जीवन जी रहे हैं, जो कभी पूरी तरह श्रवण बाधित माने जाते थे। 

उन्होंने बताया कि जन्म से छह वर्ष तक की आयु बच्चे के मस्तिष्क और भाषा विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि इस अवधि में श्रवण हानि की पहचान कर समय पर कॉक्लियर इम्प्लांट कर दिया जाए, तो बच्चा सामान्य बच्चों की तरह भाषा सीख सकता है और भविष्य में शिक्षा, रोजगार तथा सामाजिक जीवन में किसी प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। इसलिए जन्म के बाद नवजात शिशुओं की श्रवण जांच और समय पर उपचार अत्यंत आवश्यक है। 

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में प्रत्येक एक हजार नवजात शिशुओं में लगभग चार से छह बच्चे जन्मजात श्रवण हानि से प्रभावित होते हैं। समय पर जांच और आधुनिक उपचार उपलब्ध होने पर इन बच्चों का भविष्य पूरी तरह बदला जा सकता है। डॉ. अग्रवाल ने अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि यदि बच्चा तेज आवाज़ पर प्रतिक्रिया नहीं देता, बार-बार बुलाने पर भी नहीं सुनता, उम्र के अनुसार बोलना शुरू नहीं करता या भाषा विकास में देरी दिखाई देती है, तो इसे सामान्य समस्या मानकर टालना नहीं चाहिए। ऐसी स्थिति में तत्काल ईएनटी विशेषज्ञ से परामर्श लेना आवश्यक है। 

उन्होंने बताया कि आईएमएस-बीएचयू के ईएनटी विभाग में प्रत्येक बुधवार को विशेष श्रवण जांच, स्क्रीनिंग एवं जागरूकता शिविर आयोजित किया जाता है, जहां बच्चों की विस्तृत जांच, विशेषज्ञ परामर्श और आवश्यकता पड़ने पर कॉक्लियर इम्प्लांट की प्रक्रिया शुरू की जाती है। राज्य एवं केंद्र सरकार की विभिन्न स्वास्थ्य योजनाओं के अंतर्गत पात्र बच्चों का कॉक्लियर इम्प्लांट और उपचार नि:शुल्क उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को भी विश्वस्तरीय चिकित्सा सुविधा का लाभ मिल सके। 

आज आईएमएस-बीएचयू का ईएनटी विभाग आधुनिक तकनीक, अनुभवी चिकित्सकों और समर्पित पुनर्वास सेवाओं के माध्यम से हजारों परिवारों के जीवन में नई उम्मीद जगा रहा है। यह संस्थान केवल बच्चों को सुनने की क्षमता ही नहीं दे रहा, बल्कि उनके भविष्य को नई दिशा, नई पहचान और नए सपनों की उड़ान भी दे रहा है। सच मायनों में कॉक्लियर इम्प्लांट आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का वह चमत्कार है, जिसने खामोश बचपन में फिर से आवाज़, मुस्कान और खुशियां लौटा दी हैं। 

डॉ. एस.के. अग्रवाल ✍️

ईएनटी विभाग, आईएमएस बीएचयू

मो0 नं0- 9918880048, 7275721672




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