जनसंख्या को बोझ नहीं, मानव संसाधन बनाकर ही बदली जा सकती है तस्वीर : डॉ. गणेश पाठक, पर्यावरणविद्
विश्व जनसंख्या दिवस केवल बढ़ती आबादी के आंकड़ों पर चिंता व्यक्त करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह आत्ममंथन का भी दिन है कि उपलब्ध संसाधनों के बीच बढ़ती जनसंख्या का संतुलित और नियोजित उपयोग किस प्रकार किया जाए। जनसंख्या वृद्धि आज केवल राष्ट्रीय या वैश्विक विषय नहीं रह गई है, बल्कि इसका प्रभाव स्थानीय स्तर पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। उत्तर प्रदेश का सीमावर्ती जनपद बलिया इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहां लगातार बढ़ती आबादी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश को गहराई से प्रभावित कर रही है।
डॉ. गणेश पाठक का मानना है कि जनसंख्या वृद्धि एक ओर अनेक चुनौतियां उत्पन्न करती है, वहीं दूसरी ओर यही जनसंख्या यदि शिक्षित, कुशल और उत्पादक बने तो सबसे बड़ी मानव शक्ति भी सिद्ध हो सकती है। इसलिए जनसंख्या को केवल समस्या के रूप में देखने के बजाय उसे मानव संसाधन के रूप में विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
यदि बलिया जनपद की जनसंख्या वृद्धि पर दृष्टि डालें तो प्रारंभिक दो दशकों को छोड़कर वर्ष 1931 से 2011 तक जनसंख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। वर्ष 1901 में जहां जनपद की जनसंख्या लगभग 9.89 लाख थी, वहीं वर्ष 2011 तक यह बढ़कर 32.39 लाख हो गई। वर्ष 2021 की अनुमानित जनसंख्या 35.63 लाख से अधिक आंकी गई है, जबकि कुछ अध्ययनों के अनुसार यह संख्या 37 लाख से भी ऊपर पहुंच चुकी है। इस प्रकार एक शताब्दी में बलिया की जनसंख्या में लगभग 196 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसने विकास की गति पर व्यापक प्रभाव डाला है।
जनसंख्या वृद्धि का सबसे अधिक असर सामाजिक ढांचे पर दिखाई देता है। संसाधनों पर बढ़ते दबाव के कारण रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी मूलभूत सुविधाओं पर संकट गहराता जा रहा है। सामाजिक असमानताएं बढ़ रही हैं और पारिवारिक तथा सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन देखने को मिल रहा है। यदि समय रहते इस दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में सामाजिक चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।
बढ़ती आबादी का सीधा संबंध बेरोजगारी से भी है। सीमित रोजगार के अवसरों के बीच बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं। शिक्षित युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी आर्थिक ही नहीं, सामाजिक चिंता का विषय भी बनती जा रही है। रोजगार के अभाव में कुछ लोग नशाखोरी, अपराध और अन्य अनैतिक गतिविधियों की ओर आकर्षित हो जाते हैं, जिससे सामाजिक ताना-बाना कमजोर पड़ता है। इसलिए जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ रोजगार सृजन और कौशल विकास पर विशेष बल देना आवश्यक है।
आर्थिक दृष्टि से भी बढ़ती जनसंख्या ने बलिया के विकास को प्रभावित किया है। भोजन, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, परिवहन और अन्य आधारभूत सुविधाओं पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। सीमित संसाधनों के कारण प्रति व्यक्ति उपलब्ध सुविधाएं घटती जा रही हैं, जिससे जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। यही कारण है कि जनसंख्या वृद्धि केवल संख्या का विषय नहीं, बल्कि विकास, समान अवसर और सामाजिक न्याय का भी प्रश्न बन चुकी है।
सांस्कृतिक दृष्टि से भी जनसंख्या वृद्धि का प्रभाव देखा जा सकता है। तेजी से बदलती जीवनशैली, संसाधनों का असमान वितरण और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण सामाजिक समरसता एवं सांस्कृतिक मूल्यों पर भी प्रभाव पड़ रहा है। यदि विकास योजनाओं में जनसंख्या के अनुरूप संसाधनों का विस्तार नहीं किया गया तो भविष्य में यह असंतुलन और अधिक गहरा सकता है।
विश्व जनसंख्या दिवस हमें यह संदेश देता है कि जनसंख्या स्वयं समस्या नहीं है, बल्कि उसका अनियोजित विस्तार और संसाधनों का असंतुलित उपयोग चुनौती है। यदि प्रत्येक व्यक्ति को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं तो यही बढ़ती जनसंख्या राष्ट्र और समाज की सबसे बड़ी पूंजी बन सकती है।
बलिया जैसे जनपद के लिए आवश्यक है कि जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ मानव संसाधन विकास, स्वरोजगार, कौशल विकास, महिला शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता और परिवार नियोजन जैसे विषयों पर व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाए जाएं। तभी बढ़ती आबादी विकास में बाधा बनने के बजाय समृद्धि की नई संभावनाओं का आधार बन सकेगी।
विश्व जनसंख्या दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि बढ़ती जनसंख्या को संकट नहीं, बल्कि सुनियोजित विकास, शिक्षा, रोजगार और जागरूकता के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति बनाया जाए।
डॉ. गणेश पाठक, पर्यावरणविद्बलिया, उत्तर प्रदेश



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