गंगा दशहरा विशेष : मां गंगा को प्रदूषण मुक्त और सतत प्रवाही बनाने के लिए फिर चाहिए ‘भगीरथ प्रयास’ : डॉ. गणेश पाठक


गंगा केवल नदी नहीं, भारतीय संस्कृति, सभ्यता और आस्था की जीवनधारा है। इसके संरक्षण के लिए सरकार के साथ समाज की सहभागिता भी अनिवार्य है। यह विचार प्रख्यात पर्यावरणविद् एवं चिंतक डॉ. गणेश पाठक, सदस्य जिला गंगा समिति बलिया (उ.प्र.) ने गंगा दशहरा के अवसर पर व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मां गंगा के प्रति अपने दायित्वों को स्मरण करने का भी अवसर है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इसी दिन महाराजा भगीरथ ने कठोर तपस्या कर मां गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित कराया था, जिससे उनके पूर्वजों का उद्धार हुआ और मानव समाज को जीवनदायिनी जलधारा प्राप्त हुई।

डॉ. पाठक ने कहा कि आज गंगा दशहरा की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है, क्योंकि वर्तमान समय में मां गंगा गंभीर प्रदूषण और जल संकट का सामना कर रही हैं। एक समय अपने निर्मल जल और आत्मशुद्धिकरण क्षमता के लिए प्रसिद्ध गंगा आज औद्योगिक अपशिष्ट, नगरों के सीवर, प्लास्टिक कचरे और रासायनिक प्रदूषण की मार झेल रही है। स्थिति यह है कि अनेक स्थानों पर गंगा का जल स्नान योग्य भी नहीं रह गया है।

उन्होंने कहा कि गंगा करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र होने के साथ-साथ देश की सांस्कृतिक पहचान और आर्थिक जीवनरेखा भी है। गंगा तट पर ही भारतीय सभ्यता का विकास हुआ और आज भी करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि और सामाजिक जीवन गंगा पर निर्भर है। इसके बावजूद मानव की भोगवादी प्रवृत्ति और स्वार्थपूर्ण गतिविधियों ने गंगा के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है।

डॉ. पाठक ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि विभिन्न बांधों, नहरों और जल परियोजनाओं के कारण गंगा की प्राकृतिक और अविरल धारा प्रभावित हुई है। विशेष रूप से टिहरी बांध के निर्माण के बाद कई क्षेत्रों में जल प्रवाह में कमी आई है, जिससे नदी के तल में गाद और बालू का जमाव बढ़ा है। परिणामस्वरूप अनेक स्थानों पर गंगा की धारा सिकुड़ती जा रही है और गर्मी के दिनों में नदी के कुछ हिस्सों को पैदल पार करना संभव हो गया है।

उन्होंने बताया कि गंगा घाटी की संपूर्ण पारिस्थितिकी—जल, मिट्टी, वनस्पति और जलीय जीव-जंतुओं का संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। प्रदूषण और जल की कमी के कारण डॉल्फिन सहित कई जलीय जीवों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। वहीं नदी तल के उथले होने से नौवहन प्रभावित हो रहा है तथा वर्षा ऋतु में बाढ़ की समस्या भी बढ़ रही है।

डॉ. पाठक ने कहा कि सरकार द्वारा गंगा की स्वच्छता और अविरलता के लिए अरबों रुपये की योजनाएं संचालित की गई हैं, लेकिन अपेक्षित परिणाम अभी भी नहीं मिल सके हैं। इसके लिए योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ जनसहभागिता को बढ़ाना होगा। उन्होंने कहा कि यदि गंगा तटवासी और आम नागरिक यह संकल्प लें कि वे गंगा में कूड़ा, प्लास्टिक, सीवर या अन्य प्रदूषक पदार्थ नहीं डालेंगे, तो गंगा की स्वाभाविक शुद्धिकरण क्षमता उसे पुनः निर्मल बना सकती है।

गंगा दशहरा के अवसर पर उन्होंने समाज से आह्वान किया कि जिस प्रकार राजा भगीरथ ने मानव कल्याण के लिए कठोर तप किया था, उसी प्रकार आज प्रत्येक नागरिक को मां गंगा के संरक्षण के लिए ‘भगीरथ प्रयास’ करना होगा। तभी मां गंगा अपनी पवित्रता, निर्मलता और अविरलता को पुनः प्राप्त कर लोककल्याण की धारा के रूप में सदैव प्रवाहित रह सकेगी।



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