आलीशान बंगले का सुख या पेड़ो की छाँव लिखूँ,
तुझे शहरों का खेलग्राउण्ड या गावों का खलिहान लिखूँ।
बोल तुझे मैं क्या क्या लिखूँ......
विल्डिंगो की टैरेस तुमको या छप्पर के मकान लिखूँ,
गाँवो का सुकून लिखूँ या शहरों की थकान लिखूँ,
बोल तुम्हे मैं क्या क्या लिखूँ......
देशभक्त सैनिक तुमको या अफजल और कसाब लिखूँ ,
गंगा का पावन जल तुमको या रातों की मंदिरा और सबाव लिखूँ,
बोल तुम्हे मैं क्या क्या लिखूँ......
दो हँसो का जोड़ा तुमको या बाल्मीक का बाण लिखूँ,
कपटी लंका राज लिखूँ या मर्यादा पुरुषोत्तम राम लिखूँ,
बोल तुम्हे मैं क्या क्या लिखूंँ......
द्रौपदी का मान लिखूँ या दुस्सासन का परिहास लिखूँ ,
दिन की चमक दुपहरी तुमको या अंधेरों का आभास लिंखू़ँ,
बोल तुम्हे मैं क्या क्या लिखूंँ......
मंदिर के घण्टे तुमको या मस्जिद की अज़ान लिखूँ,
हिन्दू मुस्लिम दंगे तुमको या मधुशाला का संवाद लिखूँ,
बोल तुझे मैं क्या लिखू़ँ......
दीपक सिंह (पीसीएस) ✍️


0 Comments