बलिया। डॉ. निर्भय नारायण सिंह, एडवोकेट, समाजशास्त्री एवं चिंतक तथा पूर्व अध्यक्ष, फौजदारी बार एसोसिएशन, बलिया (उ.प्र.) ने जनहित को ध्यान में रखते हुए भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 को हटाए जाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि इस धारा का मूल उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा करना रहा है, किंतु व्यवहार में इसके दुरुपयोग के अनेक मामले सामने आ रहे हैं, जिससे समाज में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
डॉ. सिंह के अनुसार, वर्तमान समय में युवाओं में विवाह से पूर्व संबंधों को लेकर बढ़ती उतावली और भावनात्मक जल्दबाजी के चलते आपसी सहमति से बने निजी संबंधों के टूटने पर आपराधिक मुकदमों का सहारा लिया जा रहा है। ऐसे में धारा 69 के अंतर्गत फर्जी या दुर्भावनापूर्ण मामलों की संख्या बढ़ी है, जिससे निर्दोष व्यक्तियों की सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक जीवन और भविष्य पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रकार के मुकदमे कई बार दोनों पक्षों की मर्यादा को धूमिल करते हैं।
साथ ही डॉ. सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलना अत्यंत आवश्यक है और महिलाओं की सुरक्षा से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। किंतु कानून का दुरुपयोग रोकना भी उतना ही जरूरी है।
उन्होंने कहा कि जब किसी कानून से समाज में भय, अविश्वास और वैमनस्य बढ़ने लगे, तो उस पर पुनर्विचार करना लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्यता बन जाती है।
इसी क्रम में डॉ. निर्भय नारायण सिंह ने केंद्र एवं राज्य सरकार से मांग की कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 को जनहित में निरस्त किया जाए अथवा इसे पूरी तरह पुनर्परिभाषित किया जाए, ताकि इसका उपयोग केवल वास्तविक और प्रमाणित मामलों तक ही सीमित रहे। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि धारा को हटाना संभव न हो, तो कम से कम इसमें कठोर प्रारंभिक जांच, साक्ष्यों की अनिवार्यता और फर्जी शिकायतकर्ताओं के विरुद्ध दंड का स्पष्ट प्रावधान किया जाए।
अंत में उन्होंने युवाओं से संयम, समझदारी और सामाजिक मूल्यों के पालन की अपील करते हुए कहा कि विवाह जैसे पवित्र संस्कार की गरिमा बनाए रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। कानून का उद्देश्य समाज को जोड़ना है, न कि उसे तोड़ना। इसलिए समय आ गया है कि सरकार, समाज और न्याय व्यवस्था मिलकर ऐसे संतुलित निर्णय लें, जिससे न्याय भी हो और सामाजिक सौहार्द भी बना रहे।


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