(सादगी, सिद्धांत और समाजवाद की जीवित मिसाल)
भारतीय राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं जो पद, सत्ता और प्रसिद्धि से बड़े हो जाते हैं। वे अपने जीवन, विचारों, कर्तव्यों और नैतिकता से किंवदंती का रूप ले लेते हैं। उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र ऐसी ही विरल शख्सियत थे। उनकी वाणी में स्पष्टता, व्यवहार में सादगी और राजनीति में ईमानदारी-यही वह त्रिकोण था जिसने उन्हें जनमानस में छोटे लोहिया के नाम से अमर कर दिया।
डॉ. राममनोहर लोहिया की विचारधारा को जीवन का आधार मानकर राजनीति में उतरे जनेश्वर मिश्र के लिए समाजवाद कोई नारा नहीं, बल्कि जीवन-शैली था।
सामाजिक बराबरी उनके लिए संघर्ष नहीं,कर्तव्य थी।वे राजनीति को सेवा का क्षेत्र मानते थे, साधन-संग्रह का नहीं।सत्ता के हर पद पर रहते हुए उन्होंने नैतिकता की उस लौ को जलाए रखा, जो आज की राजनीति में दुर्लभ दिखाई देती है।उनकी कार्यशैली इतनी साफ-सुथरी थी कि समर्थक उन्हें “पद्यात्मक समाजवादी” कहते क्योंकि वे विचारों को भाषणों में नहीं, बल्कि अपने चरित्र में कविता की तरह जीते थे। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल,बलिया जिले में 5 अगस्त, 1933 को शुभनाथहीं गाँव में जन्में विशेषकर बलिया के स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर जनांदोलनों तक देश को साहस, संघर्ष और सामाजिक चेतना दी है। इसी चेतना की धारा से जनेश्वर मिश्र भी निकले।
उनके भाई तारकेश्वरनाथ मिश्र बताते हैं के जनेश्वर मिश्र गांव से एक बारात में गये थे उस समय जनवासा का रिवाज था जनवासे की सुबह उन्हें शौच हेतु खेत में जाना था तो पास में पड़े एक लोटे में पानी लेकर गये लौटे तो लोटे को साफ करके अपना हाथ पैर धोये इसके बाद जब उनके पिताजी और ब्राम्हण विरादरी को पता चला की जिस लोटे का प्रयोग उन्होंने किया था वह धुधुक बजाने वाला जो दलित था तो यह कहा गया कि अब इसकी परछाई नहीं पड़नी चाहिए भ्रष्ट हो गया।दो दिन उनको घर में खाना नहीं मिला। बचपन में जनेश्वर मिश्र ननिहाल गये तो एक कुएं पर धोबिन बाल्टी से पानी निकाल रही थी तो वे पानी पीने चले गये धोबिन ने पानी पिलाने से यह कहते हुए मना कर दी की हमारी जाति धोबिन है फिर जनेश्वर मिश्र ने उसकी बाल्टी से पानी निकाला और धोबिन के हाथ से पानी पिया, जब छोटे थे तो गांव में बच्चा पैदा होने पर गांव की महिला नाल काटने आती थी जो दलित वर्ग की होती थी उनके घर आयी हुई थी तो उनकी मां ने बताया कि तुम इसका दूध पीये हो यह सुनकर वे उसकी गोद में जाकर बैठ गये तो उनकी दादी ने उनको डाटा इसका प्रभाव उनके दिलो दिमाग पर बहुत असर डाला। जनेश्वर मिश्र राजनेता नहीं वे एक सामाजिक चिंतक थे और चिंतक शिविर दो दिन का लगाकर समाज की बेहतरी के लिए क्या किया जाना चाहिए ताकि पिछड़े, शोषित, दलित के अधिकारों लिए उनको अधिकार दिलाने के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय का कुशाग्र बुद्धि वाला व्यक्ति चिंतन करते थे जब उनके पास धन का अभाव था।
आपातकाल में जेल में रहे और उसके बाद लोकसभा चुनाव हुआ तो राजा मांडा विश्वनाथ प्रताप सिंह से चुनाव लड़ना तय हुआ तो जनेश्वर मिश्र जेल से निकलते ही एक जीप से राजा मांडा के महल पर गये महल के तीन तरफ पक्की रोड थी। महल की परिक्रमा की, और चुनाव की पहली सभा में उन्होंने कहा कि मेरे खिलाफ राजा मांडा चुनाव लड़ रहे हैं लोग मुझसे कह रहे थे उनके पास बहुत पैसा है और मेरे पास नहीं है मैं तो जेल में हूँ और गरीब आदमी हूँ राजा के खिलाफ कैसे चुनाव लड़ सकता तो मैंने सोचा कि सबसे पहले राजा की मिल्कियत को नापना चाहिए मैंने राजा मांडा महल को नाप आया हूं राजा की चौहद्दी तो बहुत छोटी है मैं जिस घर से आया हूं वह महल से बहुत बडी (जेल) है। पहले भाषण में जनता के दिल जीत लिया और विश्वनाथ प्रताप सिंह को नब्बे हजार वोटों से हरा दिया। छात्र जीवन में ही राजनीति और समाजसेवा से जुड़ गए थे।
गांव-गांव, खेत-खेत, मजदूर और किसान के बीच उनकी पहचान “हमारे नेता” के रूप में बन गई। उनकी बोली सरल, हृदय विशाल और स्वभाव पूरी तरह जनता के बीच घुला-मिला था। देश की राजनीति में जहाँ शोर, चमक-दमक और प्रचार-प्रसार को महत्व मिलता है, वहीं जनेश्वर मिश्र का जीवन एक अलग राह दिखाता है। सरकारी आवास मिला लेकिन दरवाज़े हर गरीब के लिए हमेशा खुले रहे। कभी आवास में ताला नहीं लगाया। एक कॉल, एक चिट्ठी या किसी का दुख-मिश्र जी तुरंत खड़े हो जाते थे।
राजनीति में रहते हुए उन्होंने न वैभव लिया, न परिवार को आगे बढ़ाया। उनका मानना था राजनीति व्यापार नहीं, समाज का विश्वास है। ”जनेश्वर मिश्र मंत्री रहे, सांसद रहे, संगठन के शीर्ष पदों पर रहे-लेकिन पहचान हमेशा एक ही रही जनता का नेता। श्रमिकों, किसानों, वंचितों और पिछड़ों के मुद्दे वे लगातार उठाते रहे। नीतियों में पारदर्शिता, योजनाओं में न्याय और प्रशासन में संवेदना उनका मूल मंत्र था। उनके भाषण सदन में गूंजते नहीं थे, झकझोरते थे।विचारों के आदान-प्रदान में वे कटुता नहीं, तर्क और विनम्रता का प्रयोग करते थे।
डाॅ. राम मनोहर लोहिया के निधन के बाद इलाहाबाद में आयोजित श्रंद्धाजलि कार्यक्रम में समाजवादी नेता छुन्नू द्वारा कहा गया कि राम मनोहर लोहिया ने शरीर भले त्याग दिया फिर भी हमारे बीच में एक छोटा लोहिया मौजूद है तभी से उन्हें छोटे लोहिया के नाम से जाना जाने लगा।लोहिया की तरह सरल जीवन सामाजिक असमानता के खिलाफ आवाज़ और सिद्धांतों पर अडिग रहना जीवन का अंग था।यही गुण उन्हें लोहिया के बाद समाजवादी विचारधारा का सबसे प्रखर वाहक बनाते हैं। जनेश्वर मिश्र किसी पार्टी, पद या प्रदेश तक सीमित नहीं थे। वे स्वच्छ राजनीति का चेहरा थे।वे गरीब-केन्द्रित विकास की आवाज़ के साथ लोकतंत्र में नैतिकता के प्रहरी थे।
आज जब राजनीति में मूल्यों का क्षरण दिखाई देता है, तब मिश्र जी की जीवन-शैली आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बनकर सामने आती है। जनेश्वर मिश्र का जीवन सिखाता है कि नेता बनने के लिए भीड़ नहीं,चरित्र चाहिए। उनकी सादगी, समाजवाद और सेवा आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित हैं। एक बार इलाहाबाद में पाकिस्तानी मशहूर गज़ल गायक का कार्यक्रम लगा तो कुछ छात्र नेता जनेश्वर मिश्र जी के आवास पहुंच कर निवेदन किये कि डीएम/कमीश्नर को फोन करके पास दिला दीजिए तो उन्होंने अपने साथ रहने वाले तिवारी को बुलाये और बोले कि तिवारी एक डंडा लाओ ये साले गज़ल सुनने जायेगें मां-बाप पैसा भेज रहे हैं पढ़ने के लिए, ला डंडा।
जनेश्वर मिश्र कहा करते थे जाति की राजनीति करने वाले नेताओं में लोकतांत्रिक क्रांति करने की क्षमता हो सकती है क्रांति कर सकते हैं मगर वे अपने परिवार पैसा प्रापर्टी से उठ नहीं सकते यह बात पूरे देश में देखने को मिलता है कि जो लोग जाति की राजनीति किये अपने परिवार और पेसे से उपर नहीं उठ सके।
वे राजनीति में थे, लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर मानवीय मूल्यों के प्रतिनिधि बन गए।
22 जनवरी 2010 को वे सदा के लिए शरीर से अलग होकर भी उनके विचार अविस्मरणीय है।
सामाजिक चिंतक
मऊ (उ.प्र.)



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