अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस हर वर्ष 11 दिसंबर को पर्वतों के महत्व, संरक्षण और मानव जीवन में उनकी उपयोगिता को रेखांकित करने के उद्देश्य से मनाया जाता है। यह दिवस संयुक्त राष्ट्र संगठन द्वारा वर्ष 2003 में घोषित किया गया था ताकि विश्व समुदाय पर्वतीय पारिस्थितिकी, जैव विविधता और वहां निवास करने वाले लोगों की चुनौतियों को समझ सके और उनके संरक्षण के लिए प्रभावी कदम उठा सके। पर्वत केवल प्राकृतिक संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि वे जीवन, संस्कृति, प्रेरणा और अस्तित्व का मूल आधार हैं। दुनिया की लगभग 15% जनसंख्या पर्वतीय क्षेत्रों में निवास करती है और पृथ्वी की लगभग 50% जैव विविधता पहाड़ों में पाई जाती है। पर्वत नदियों, झरनों, ग्लेशियरों और जलभंडारों के माध्यम से संपूर्ण मानवता के लिए जीवनदायी जल का स्रोत हैं। हिमालय, आल्प्स, एंडीज़, रॉकी पर्वत श्रृंखलाएँ न केवल प्रकृति की अद्भुत रचनाएं हैं बल्कि संस्कृतियों, आस्थाओं और सभ्यताओं की धरोहर भी हैं। विशेष रूप से भारत में हिमालय को ‘देवभूमि’, ‘गंगा का स्रोत’ और ‘आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र’ कहा जाता है।
लेकिन इन पर्वतों के सामने वर्तमान समय में अनेक चुनौतियाँ खड़ी हैं। जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई, ग्लेशियरों का पिघलना, अनियंत्रित पर्यटन, खनन, पर्यावरण दोहन और नगरीकरण पर्वतीय पारिस्थितिकी को तेजी से प्रभावित कर रहे हैं। वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार हिमालय के 75% ग्लेशियर आने वाले दशकों में सिकुड़ सकते हैं, जिसका प्रभाव केवल पर्वतीय क्षेत्र ही नहीं बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन के रूप में दिखाई देगा। पर्वतों की मिट्टी नाजुक होती है और एक छोटी सी पर्यावरणीय गड़बड़ी भूस्खलन, जल प्रलय, भू-स्खलन और प्राकृतिक आपदाओं को जन्म दे सकती है। यही कारण है कि पर्वतीय पर्यावरण की रक्षा, स्थानीय जनजातीय संस्कृति का सम्मान और सतत विकास की योजना बनाना आज मानवता की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस का उद्देश्य न केवल पर्वतीय क्षेत्रों की जटिलताओं को समझना है बल्कि सरकारों, संस्थाओं, शोधकर्ताओं, समाज और आम नागरिकों के बीच जागरूकता बढ़ाने का भी है। पर्वत संरक्षण केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का विषय है। हमें पर्यटन को पर्यावरण-अनुकूल बनाना होगा, वन क्षेत्रों को पुनर्जीवित करना होगा, जल स्रोतों की रक्षा करनी होगी और स्थानीय समुदायों को स्वावलंबी बनाना होगा।
पर्वत हमें सिखाते हैं— ऊँचाइयाँ विनम्रता से प्राप्त होती हैं, स्थिरता ही शक्ति है, और प्रकृति के साथ संतुलन में ही जीवन संभव है। इसलिए यह दिवस सिर्फ एक आयोजन नहीं बल्कि एक संकल्प है—भविष्य की पीढ़ियों के लिए पर्वतों को सुरक्षित रखने का, प्रकृति का सम्मान करने का और पृथ्वी के संतुलन को बनाए रखने का।
निस्संदेह, पर्वत पृथ्वी की धरोहर, मानव सभ्यता के रक्षक और प्रकृति की धड़कन हैं। यदि हम इन्हें संरक्षित रख पाए, तभी भविष्य की पीढ़ियाँ शुद्ध जल, शुद्ध वायु और संतुलित जलवायु का लाभ उठा सकेंगी।
परिवर्तन चक्र समाचार सेवा ✍️


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