रामभक्ति का दीप, विश्वास का उदय : श्री रामलला प्राण प्रतिष्ठा की द्वितीय वर्षगांठ


रामलला प्राण प्रतिष्ठा की द्वितीय वर्षगांठ पर विशेष लेख

अयोध्या, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम की जन्मभूमि, 22 जनवरी 2024 को उस ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनी जब करोड़ों भक्तों की तप, संयम और आस्था का सपना मूर्त रूप लेकर भव्य श्री राम मंदिर में श्री रामलला की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हुई। वह समय केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता और गौरव के पुनर्जागरण का दिवस था। आज, तिथि अनुसार इसी दिव्य आयोजन की दूसरी वर्षगांठ पर पूरा देश एक बार फिर भाव-विभोर होकर उस अलौकिक क्षण को स्मरण कर रहा है जिसने वैश्विक स्तर पर भारत की आध्यात्मिक पहचान को नई ऊँचाई प्रदान की।

सदियों के संघर्ष और प्रतीक्षा के बाद राम मंदिर का निर्माण संभव हुआ। 2019 के न्यायिक निर्णय और 2020 के भूमि पूजन के पश्चात 22 जनवरी 2024 को भक्ति, करुणा, भाव, अश्रु और श्रद्धा का संगम अयोध्या की धरती पर उतरा — जब वैदिक मंत्रों, अनुष्ठानों और जय श्री राम के उद्घोषों के बीच रामलला के बाल स्वरूप ने मंदिर के गर्भगृह में दिव्यता से अपना स्थान ग्रहण किया। आज 2026 में दूसरी वर्षगांठ का उत्सव इस बात का प्रतीक है कि अयोध्या केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं रही, वह आध्यात्मिक राष्ट्र-चेतना का जीवंत केंद्र बन चुकी है। रामपथ, धर्मपथ, जनकपुर मार्ग, सरयू तट का दिव्य रूपांतरण, भव्य मंदिर का आलोक, निरंतर बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या — यह सब परिवर्तन दर्शाते हैं कि अयोध्या अब भारत के सांस्कृतिक नवजागरण की धुरी बन चुकी है।

रामलला की बाल स्वरूप प्रतिमा में मासूमियत, शक्ति और करुणा का अद्भुत संगम दिखाई देता है। उस मूर्ति के दर्शन मात्र से मन के भीतर यह अनुभूति उतरती है कि “राम कभी दूर नहीं थे, बस हमारे विश्वास को पुनर्जीवित होने की आवश्यकता थी।” प्राण प्रतिष्ठा की यह वर्षगांठ केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह स्मरण कराती है कि प्रभु राम आदर्श का रूप हैं — सत्य उनका जीवन, कर्तव्य उनका धर्म, त्याग उनका मार्ग और रामराज्य उनका लक्ष्य। आज के समय में जब भौतिक प्रगति के बीच नैतिकता और मर्यादा का क्षय दिखाई देता है, राम का जीवन हमें यह सिखाता है कि सफलता तभी सार्थक है जब उसमें धर्म, करुणा, शील और कर्तव्य निहित हो।

रामराज्य एक कल्पना भर नहीं, बल्कि जीवनशैली का दर्शन है — जहाँ न्याय हो, समानता हो, सुरक्षा हो, समाज में सद्भाव हो और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सुख व सम्मान हो। इस दूसरी वर्षगांठ के अवसर पर हमें यह आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या हमने राम को केवल मंदिर तक सीमित रखा है या अपने आचरण, विचार और व्यवहार में भी उन्हें स्थान दिया है? क्या हमने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को मर्यादा और धर्म के साथ निभाया है? यदि नहीं तो यह अवसर हमें एक नई प्रतिज्ञा लेने का आह्वान देता है — कि राम केवल श्रद्धा नहीं, हमारा आचरण भी बनें।

श्री राम का संदेश सीमा, देश, भाषा और वर्ग से परे है। विश्वभर में फैले करोड़ों भारतीयों और हिंदू समुदाय की भावनाएँ इस आयोजन से जुड़ी हैं, जो इसे मानवता की विजय मानते हैं। राम प्रेम, दया, एकता और सर्व-कल्याण के प्रतीक हैं — उनका संदेश ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ सम्पूर्ण विश्व के लिए शांति और सौहार्द का मार्गदर्शन है।

श्री रामलला प्राण प्रतिष्ठा की द्वितीय वर्षगांठ यह प्रेरणा देती है कि हर मन, हर घर, हर परिवार और हर समाज में एक दीप जलता रहे — मर्यादा का, प्रेम का, त्याग का और धर्म का। जब भारत का हर नागरिक अपने जीवन में राम के आदर्शों का पालन करेगा, तभी वास्तव में रामराज्य की ओर कदम बढ़ेंगे।

जय श्री राम – जय जय श्री रघुकुल तिलक।


डॉ. निर्भय नारायण सिंह, एडवोकेट✍️ 

पूर्व अध्यक्ष, फौजदारी अधिवक्ता संघ, बलिया (उ.प्र.)




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