विजयादशमी (दशहरा) : असत्य पर सत्य की विजय का पर्व


भारत त्योहारों की भूमि है और यहां हर पर्व का संदेश जीवन को दिशा देने वाला होता है। इन्हीं में से एक है विजयादशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है। यह पर्व आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन शक्ति, साहस और धर्म की विजय का प्रतीक है।

ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

विजयादशमी के दिन भगवान श्रीराम ने अहंकारी रावण का वध कर धर्म की स्थापना की थी। यह घटना दर्शाती है कि चाहे असत्य और अधर्म कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः उसकी हार निश्चित है।

इसी दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर संसार को आतंक से मुक्त किया। इसीलिए दशहरा शक्ति, विजय और न्याय का पर्व माना जाता है।

परंपराएं और उत्सव

  • देशभर में इस दिन रामलीला का मंचन होता है, जिसमें भगवान राम की जीवन गाथा और रावण दहन प्रमुख आकर्षण होता है।
  • जगह-जगह विशालकाय पुतले बनाए जाते हैं—रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के—जिन्हें अग्नि के हवाले किया जाता है। यह दुष्टता के अंत और सद्गुणों के प्रसार का प्रतीक है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में लोग शस्त्र पूजन और आयुध पूजा भी करते हैं। किसान अपने हल और व्यापारी अपने औजारों की पूजा कर नए संकल्प के साथ कार्य प्रारंभ करते हैं।

सामाजिक और सांस्कृतिक संदेश

विजयादशमी हमें यह सीख देती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, अगर हम सत्य और धर्म के मार्ग पर हैं, तो अंततः विजय हमारी ही होगी। यह त्योहार बुराई, अहंकार, लोभ और क्रोध को त्यागने और सत्य, संयम, करुणा और परोपकार को अपनाने की प्रेरणा देता है।

निष्कर्ष

दशहरा केवल एक पर्व नहीं बल्कि जीवन का संदेश है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि समाज और व्यक्ति, दोनों ही तब प्रगति कर सकते हैं जब वे अपने भीतर के ‘रावण’ को पराजित करें और सद्गुणों की स्थापना करें। इसलिए विजयादशमी को पूरे उत्साह और श्रद्धा से मनाना चाहिए।






धीरेन्द्र प्रताप सिंह ✍️ 

सहतवार, बलिया (उ.प्र.)

मो. नं. - 9454046303




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