बलिया। वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. निर्भय नारायण सिंह ने देश में राजनीतिक गतिविधियों, कथित तौर पर बच्चों को राजनीतिक विमर्श से जोड़ने तथा सत्ता परिवर्तन के लिए अपनाए जाने वाले तरीकों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक और संवैधानिक देश है, जहां सत्ता परिवर्तन का एकमात्र वैध आधार संविधान के प्रावधानों के अनुरूप चुनावी प्रक्रिया और जनता का जनादेश है। किसी भी राजनीतिक दल, संगठन अथवा समूह को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था संविधान से संचालित होती है और यहां सरकारों का गठन तथा परिवर्तन संवैधानिक मर्यादाओं के अंतर्गत ही होता है।
डॉ. सिंह ने कहा कि कॉकरोच पार्टी को लेकर जिस प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों और सहयोग की चर्चा हो रही है, उसके संबंध में यह समझना आवश्यक है कि किसी संगठन की राजनीतिक स्थिति, पंजीकरण एवं मान्यता का निर्धारण संबंधित कानूनी प्रावधानों और सक्षम निर्वाचन प्राधिकरण के नियमों के अनुसार होता है। यदि कोई संगठन अपंजीकृत अथवा अमान्यता प्राप्त है, तो उसके साथ किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का सहयोग भी कानून और निर्वाचन संबंधी नियमों के अनुरूप ही होना चाहिए। राजनीतिक गतिविधियों में शामिल सभी पक्षों की जिम्मेदारी है कि वे संवैधानिक व्यवस्था का सम्मान करें और किसी भी कदम से पहले उसकी विधिक वैधता सुनिश्चित करें।
उन्होंने विशेष रूप से कहा कि छोटे बच्चों को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए गुमराह करना उचित नहीं है। बच्चों का समय पढ़ाई, खेलकूद, संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण में लगना चाहिए। उन्हें किसी राजनीतिक विवाद, विरोध अथवा सत्ता संघर्ष का माध्यम बनाने के बजाय बेहतर शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य के अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए। लोकतंत्र में विचारों की स्वतंत्रता का अपना महत्व है, लेकिन बच्चों के भविष्य और उनकी शिक्षा को राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर रखना प्रत्येक नागरिक और राजनीतिक संगठन का दायित्व है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने विरोधी राजनीतिक दलों और नेताओं को सलाह देते हुए कहा कि उन्हें अपनी राजनीतिक सोच और कार्यशैली में सकारात्मक परिवर्तन लाना चाहिए। केवल विरोध करने, विवाद खड़ा करने अथवा असामान्य राजनीतिक गतिविधियों के माध्यम से सत्ता परिवर्तन की अपेक्षा करना लोकतांत्रिक परंपराओं के अनुकूल नहीं है। यदि किसी दल या नेता को वर्तमान सरकार की नीतियों से असहमति है, तो उसे अपनी बात तथ्यों, तर्कों और जनहित के मुद्दों के आधार पर जनता के सामने रखनी चाहिए। जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझना, उनके विश्वास को जीतना और उनके समर्थन एवं आशीर्वाद से जनादेश प्राप्त करना ही लोकतंत्र का वास्तविक रास्ता है।
डॉ. सिंह ने कहा कि भारत की जनता ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। जनता अपने मताधिकार के माध्यम से सरकारों का चुनाव करती है और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बदलने का अधिकार भी रखती है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि जनता के समर्थन के बिना केवल राजनीतिक शोर-शराबे या दबाव की राजनीति से सत्ता परिवर्तन संभव है। लोकतंत्र में जनमत सर्वोपरि है और जनादेश का सम्मान करना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि भारत की तुलना नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में घटित राजनीतिक घटनाक्रमों से करके यहां वैसी ही परिस्थितियां उत्पन्न करने की कोशिश करना उचित नहीं है। प्रत्येक देश की अपनी राजनीतिक परिस्थितियां, संवैधानिक व्यवस्थाएं और सामाजिक संरचनाएं होती हैं। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार उसका संविधान, स्वतंत्र निर्वाचन प्रक्रिया और कानून का शासन है। इसलिए देश में किसी भी प्रकार के राजनीतिक परिवर्तन की कल्पना भारतीय संविधान की मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप ही की जानी चाहिए। भारत को किसी अन्य देश की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप ढालने अथवा यहां अस्थिरता पैदा करने की कोशिश के बजाय देश की संवैधानिक संस्थाओं को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन मतभेदों को मनभेद में बदलना और राजनीतिक विरोध को संवैधानिक व्यवस्था के विरुद्ध खड़ा करना देशहित में नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की जिम्मेदारी है कि वे लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करें, जनता के प्रति जवाबदेह रहें और देश की एकता, अखंडता तथा सामाजिक सद्भाव को सर्वोपरि रखें। विपक्ष का दायित्व सरकार की नीतियों की समीक्षा करना और जनहित के मुद्दे उठाना है, जबकि सत्ता पक्ष को जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरना चाहिए। दोनों पक्षों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा ही लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।
अंत में डॉ. निर्भय नारायण सिंह ने कहा कि राजनीतिक दलों और नेताओं को अपनी सीमाओं तथा जिम्मेदारियों को समझते हुए जनता के बीच जाना चाहिए। जनता का विश्वास अर्जित करना, लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेना और संवैधानिक नियमों का पालन करना ही सत्ता परिवर्तन का उचित मार्ग है। भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी जनता, संविधान और कानून के शासन में निहित है। इसलिए सभी राजनीतिक पक्षों को चाहिए कि वे किसी भी प्रकार के भटकाव से बचें, बच्चों की शिक्षा और भविष्य की रक्षा करें तथा देश में संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक परंपराओं और सामाजिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए जिम्मेदारी से काम करें।

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