ममता, आस्था और संतान की दीर्घायु का पर्व है जितिया


जितिया अथवा जीवित्पुत्रिका महापर्व भारतीय लोकपरंपरा में मातृत्व, त्याग और संतान के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक माना जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व पर माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, स्वस्थ जीवन, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना से व्रत रखती हैं। लोक आस्था से जुड़े इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता मां का वह संकल्प है, जिसमें वह अपनी संतान के मंगल के लिए स्वयं कष्ट सहने को तैयार रहती है।

जितिया पर्व मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। पूर्वांचल और ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व की विशेष छटा देखने को मिलती है। पर्व के पहले से ही घरों में तैयारियां शुरू हो जाती हैं। महिलाएं पूजा की सामग्री जुटाने के साथ घर की साफ-सफाई करती हैं और परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार व्रत की तैयारी करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में एकत्र होकर जितिया व्रत की कथा सुनती हैं और लोकगीतों के माध्यम से अपनी आस्था व्यक्त करती हैं।

जितिया पर्व की परंपरा नहाय-खाय से शुरू होती है। इसके बाद माताएं व्रत का संकल्प लेती हैं। यह कठिन व्रत माना जाता है और अनेक महिलाएं निर्जला उपवास रखकर संतान के कल्याण की कामना करती हैं। व्रत में संयम, शुद्धता और श्रद्धा का विशेष महत्व माना गया है। पूजा-अर्चना और व्रत की निर्धारित परंपराओं के बाद विधि-विधान से पारण किया जाता है। इस दौरान महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती और जीवित्पुत्रिका से जुड़ी लोक आस्थाओं का स्मरण करते हुए संतान की लंबी आयु तथा उसके जीवन में आने वाली बाधाओं के दूर होने की प्रार्थना करती हैं।

जितिया व्रत की लोककथा राजा जीमूतवाहन से जुड़ी है। लोकमान्यता के अनुसार जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा तथा एक मां के पुत्र को बचाने के लिए अपने प्राणों तक का त्याग करने का संकल्प लिया था। उनके त्याग, करुणा और परोपकार की भावना को जितिया की लोकपरंपरा से जोड़ा जाता है। इसी कारण इस पर्व में त्याग, संरक्षण और संतान के प्रति समर्पण की भावना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि समाज को करुणा, त्याग और दूसरों के जीवन की रक्षा जैसे मानवीय मूल्यों का संदेश भी देता है।

पूर्वांचल और ग्रामीण क्षेत्रों में जितिया पर्व की पहचान पारंपरिक लोकगीतों से भी जुड़ी हुई है। महिलाएं समूह में बैठकर लोकगीत गाती हैं और व्रत की कथा सुनती हैं। इन गीतों में मां की ममता, संतान के सुख-दुख की चिंता और उसके उज्ज्वल भविष्य की कामना की भावनाएं झलकती हैं। पीढ़ियों से चली आ रही ये लोकपरंपराएं आज भी गांवों और कस्बों में जितिया पर्व की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए हैं।

बदलती जीवनशैली के बावजूद जितिया पर्व की मूल भावना आज भी कायम है। यह पर्व परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे से जोड़ने के साथ नई पीढ़ी को अपनी लोकसंस्कृति और पारिवारिक परंपराओं से परिचित कराने का अवसर देता है। बुजुर्ग महिलाओं से व्रत की विधि, कथा और लोकपरंपराओं की जानकारी नई पीढ़ी तक पहुंचती है।

जितिया महापर्व का सबसे भावपूर्ण पक्ष मां का अपनी संतान के लिए किया जाने वाला त्याग है। कठिन उपवास के दौरान भी माताएं संतान के मंगल की कामना करती हैं। यह पर्व भारतीय परिवार व्यवस्था में मां के स्नेह, त्याग और समर्पण को रेखांकित करता है। समय के साथ पर्व मनाने के तौर-तरीकों में बदलाव जरूर आया है, लेकिन परिवार के प्रति प्रेम, संतान की सुरक्षा और उसके स्वस्थ एवं सुखी जीवन की कामना आज भी इसकी मूल भावना बनी हुई है।

आस्था के साथ स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है। विशेषकर बुजुर्ग, गर्भवती, बीमार या नियमित दवा लेने वाली महिलाओं को कठिन उपवास रखने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। श्रद्धा के साथ शरीर की आवश्यकताओं और स्वास्थ्य की सुरक्षा को भी महत्व देना आवश्यक है।

जितिया महापर्व भारतीय संस्कृति में मातृत्व, नारी शक्ति और त्याग की सुंदर अभिव्यक्ति है। यह पर्व परिवार को जोड़ने, लोकपरंपराओं को जीवित रखने और नई पीढ़ी को सांस्कृतिक जड़ों से परिचित कराने का अवसर देता है। मां की प्रार्थना में संतान का सुख, उसके सपनों में संतान का भविष्य और उसके व्रत में संतान की लंबी उम्र की कामना समाहित रहती है। इसी अटूट ममता और समर्पण के कारण जितिया महापर्व आज भी भारतीय लोकजीवन में श्रद्धा, विश्वास और भावनाओं से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व बना हुआ है।

सुधा सिंह ✍️

नसीरपुर कलां, बलिया