मध्य-प्रदेश में मुरैना से लगभग 35 किमी० दूर मितावली नामक गांव में लगभग 100 फीट की ऊंचाई पर 11वीं शताब्दी में निर्मित इकत्तरसो महादेव एवं चौसठ योगिनी का ऐसा मंदिर है, जो ऐतिहासिक, पुरातात्विक, ज्योतिष, तंत्र विद्या एवं धार्मिक-आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यन्त ही प्रसिद्ध है और अब पर्यटन का स्वरूप ग्रहण करता जा रहा है। ऐसे यहत्वपूर्ण स्थान की यात्रा कर मैं खुद अपने को धन्य समझता हूं। इस मंदिर की बनावट गोलाकार है। ऐसा माना जाता है कि अपने देश की पुरानी संसद भवन भी इस मंदिर की वास्तुकला के आधार पर ही गोलाकार बना है।
इकत्तरसो महादेव मंदिर को एकत्तरसो महादेव मंदिर भी कहा जाता है। इतिहासकारों के अनुसार इकत्तरसो महादेव मंदिर/चौसठ योगिनी मंदिर का का निर्माण कच्छपघात वंश के राजा देवपाल द्वारा लगभग 1323 ई० (11वीं-14वीं शताब्दी) में कराया गया था। चौसठ योगिनी मंदिर की संरचना गोलाकार है, जिसमें चारों तरफ से 64 छोटे-छोटे कमरे बने हुए हैं। प्रत्येक कक्ष में एक शिवलिंग स्थापित हैं। ठीक बीच प्रांगण में भगवान इकत्तरसो का मुख्य मंडप है। यह सम्पूर्ण मंदिर ऊपर से पूर्णतया खुला हुआ है। इस मंदिर का निर्माण ऐसा हुआ है कि यह भूकम्परोधी है। कारण कि अनेक बार भूकम्प के तेज झटकों को सहने के बाद भी यह मंदिर क्षतिग्रस्त नहीं हुआ।
चौसठ योगिनी मंदिर ज्योतिष एवं तंत्र विद्या का केन्द्र रहा है, जहां ग्रह-की नक्षत्रों की गणना की जाती थी और तांत्रिक अपनी तंत्र साधना करते थे। इस तरह यह मंदिर तंत्र विद्या का प्रमुख पीठ रहा है। पहाड़ी की सुरम्य वातावरण एवं भीड़-भाड़ से दूर पहाड़ी पर स्थित यह तंत्र साधना का केन्द्र एकांत में होने के कारण तंत्र साधना के लिए विख्यात रहा है। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में रात के समय कोई रूकता नहीं है। यहां तक कहा जाता है कि रात में इस मंदिर में कोई पक्षी भी नहीं रूकता है।
एक पुष्ट समाचार के अनुसार चौसठ योगिनी मंदिर को अपनी विशिष्ट वास्तुकला एवं ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक महत्व के कारण विश्व धरोहर की अस्थाई सूची में शामिल कर लिया गया है। जिससे इस महत्वपूर्ण मंदिर के रख-रखाव एवं संरक्षण की आस जगी है। यदि इसको स्थाई रूप से विश्व धरोहर की सूची में शामिल कर इसको सुरक्षित एवं संरक्षित किया जाय तो निश्चित ही यह इकत्तोसर महादेव मंदिर/चौसठ योगिनी मंदिर न केवल ऐतिहासिक, पुरातात्विक, ज्योतिष तथा तंत्र साधना पीठ के रूप में पुन: अपना अस्तित्व प्राप्त कर सकता है और एक प्रमुख पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित हो सकता है, जहां देशी-विदेशी पर्यटकों सहित इतिहासकिरों, पुरातत्वविदों, ज्योतिषियों, तंत्र विद्या के साधकों, बल्कि शोधार्थियों एवं धार्मिक-आध्यात्मिक दृष्टि से दर्शनार्थियों की भीड़ लगी रहेगी, जिससे रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होंगे और इस क्षेत्र अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी। पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित हो जाने से इस क्षेत्र संरचनात्मक तत्वों की भी स्थापना होगी, जिससे यह क्षेत्र समग्र विकास की तरफ अग्रसर हो सकेगा।







