सावन की तीसरी सोमवारी पर विशेष :-
भारत में भगवान शिव की आराधना अत्यंत प्राचीन काल से होती चली आ रही है। वैदिक ग्रंथों, उपनिषदों, पुराणों तथा अन्य प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों, शिवलिंग पूजन के महत्व और शिव आराधना की विधियों का विस्तार से वर्णन मिलता है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, श्वेताश्वतर उपनिषद, मुण्डकोपनिषद, शिव पुराण, स्कंद पुराण और लिंग पुराण सहित अनेक ग्रंथों में शिव और शिवलिंग की महिमा का उल्लेख किया गया है। यही नहीं, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की पुरातात्विक खुदाई से प्राप्त कुछ अवशेषों को भी शिवलिंग से जोड़ा जाता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि भारतीय सभ्यता में शिव आराधना की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है।
सावन मास भगवान शिव की आराधना के लिए विशेष रूप से पवित्र माना जाता है। सावन की प्रत्येक सोमवारी को शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और पंचामृत से अभिषेक कर बेलपत्र, धतूरा, आक, पुष्प आदि अर्पित करते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भगवान शिव के पूर्ण मानवीय स्वरूप की अपेक्षा शिवलिंग की पूजा को इतना अधिक महत्व क्यों दिया गया है? इसके पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक भाव भी निहित है।
शिव पुराण में शिवलिंग को भगवान शिव के सूक्ष्म और स्थूल दोनों स्वरूपों का प्रतीक बताया गया है। ‘प्रणव’ अर्थात ‘ॐ’ को शिव का सूक्ष्म स्वरूप माना गया है, जबकि संपूर्ण ब्रह्मांड को शिव के विराट लिंग स्वरूप का प्रतीक माना गया है। इस दृष्टि से शिवलिंग केवल पत्थर या किसी आकृति विशेष का नाम नहीं, बल्कि उस अनंत सत्ता का प्रतीक है, जिसका न कोई आदि है और न अंत।
लिंग पुराण और स्कंद पुराण में भी लिंग की महत्ता का विस्तार से वर्णन मिलता है। संस्कृत में ‘लिंग’ का अर्थ ‘चिह्न’ या ‘प्रतीक’ होता है। अर्थात शिवलिंग भगवान शिव की निराकार और अनंत सत्ता का प्रतीक है। पुराणों में ‘लय’ से जुड़े अर्थ के माध्यम से भी लिंग की व्याख्या की गई है—जिसमें संपूर्ण सृष्टि का उद्भव होता है और अंततः जिसमें सृष्टि का लय हो जाता है, वही लिंग है।
हम जानते हैं कि ब्रह्मांड अनंत है। उसका कोई निश्चित आदि या अंत दिखाई नहीं देता। इसी अनंत और विराट सत्ता को शिवलिंग के प्रतीकात्मक स्वरूप में समझाया गया है। इसलिए मंदिरों में प्रतिष्ठित शिवलिंग को केवल पूजा की एक आकृति मानना उसके व्यापक आध्यात्मिक अर्थ को सीमित करना होगा। शिवलिंग वास्तव में सृष्टि, ऊर्जा, चेतना और परम सत्ता के अनंत स्वरूप का प्रतीक माना गया है।
लिंग पुराण में भगवान शिव को ‘अलिंग’ अर्थात निराकार बताया गया है। शिव निर्गुण और निराकार परम तत्व हैं, जबकि प्रकृति सगुण स्वरूप है। प्रकृति के विस्तार से ही सृष्टि की रचना होती है। इस प्रकार शिव और प्रकृति के संयोग से सृष्टि की अभिव्यक्ति का दार्शनिक भाव भी शिवलिंग में निहित माना गया है। संपूर्ण सृष्टि शिवमय है और अंततः उसी परम तत्व में समाहित हो जाती है।
कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति?
शिवलिंग की उत्पत्ति से संबंधित सबसे प्रसिद्ध कथा स्कंद पुराण सहित अनेक पुराणों में मिलती है। कथा के अनुसार, एक बार सृष्टि की उत्पत्ति के बाद भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच इस बात को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्मा का कहना था कि उन्होंने सृष्टि की रचना की है, इसलिए वे श्रेष्ठ हैं। वहीं भगवान विष्णु स्वयं को संपूर्ण सृष्टि का पालनकर्ता बताते हुए श्रेष्ठ मानते थे।
इसी दौरान अचानक दोनों के मध्य एक विशाल और अत्यंत तेजोमय ज्योति प्रकट हुई। वह ज्योतिर्लिंग आकाश से पाताल तक अनंत रूप में फैला हुआ प्रतीत हो रहा था। ब्रह्मा और विष्णु दोनों इस अद्भुत प्रकाश को देखकर आश्चर्यचकित रह गए। उन्हें उस ज्योति का न आदि दिखाई दे रहा था और न अंत।
दोनों ने निर्णय लिया कि इस ज्योतिर्लिंग के आदि और अंत का पता लगाया जाए। भगवान विष्णु उसके निचले छोर की खोज में नीचे की ओर चले गए, जबकि ब्रह्मा ऊपर की ओर उसके ऊपरी छोर की तलाश करने लगे। लंबे समय तक प्रयास करने के बाद भी भगवान विष्णु को उस ज्योति का अंत नहीं मिला। वे वापस लौटकर स्वीकार कर लेते हैं कि वे उस अनंत ज्योति का आदि-अंत नहीं जान सके।
वहीं ब्रह्मा जी ने अपने श्रेष्ठ होने को सिद्ध करने के लिए असत्य का सहारा लिया। उन्होंने दावा किया कि वे ज्योतिर्लिंग के ऊपरी छोर तक पहुंच गए थे। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने केतकी पुष्प को साक्षी बनाया। लेकिन शीघ्र ही ब्रह्मा के असत्य का उद्घाटन हुआ और आकाशवाणी के माध्यम से उनके झूठ का पता चला।
इसी समय भगवान शिव त्रिशूल धारण किए हुए प्रकट हुए। ब्रह्मा और विष्णु दोनों ने भगवान शिव के अनंत स्वरूप को स्वीकार कर उनकी स्तुति की। भगवान शिव ने दोनों को समझाया कि वे सृष्टि के मूल कारण हैं और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश के रूप में सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार का कार्य करते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ब्रह्मा और विष्णु उनसे अलग नहीं, बल्कि उसी परम सत्ता के विभिन्न स्वरूप हैं।
कथा के अनुसार, ब्रह्मा को असत्य बोलने के कारण दंड मिला और केतकी पुष्प को शिव पूजा से वंचित होने का श्राप प्राप्त हुआ। हालांकि विभिन्न परंपराओं और ग्रंथों में इस कथा के विवरण में कुछ भिन्नताएं भी मिलती हैं।
चूंकि भगवान शिव इस प्रसंग में सर्वप्रथम अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए, इसलिए इस घटना को शिवलिंग की महिमा और लिंग पूजा की परंपरा से जोड़ा जाता है। यह कथा मनुष्य को अहंकार छोड़कर सत्य, विनम्रता और परम सत्ता के प्रति समर्पण का संदेश देती है।
शिवलिंग की पूजा का वास्तविक संदेश भी यही है कि मनुष्य उस अनंत शक्ति को नमन करे, जिसका कोई आदि और अंत नहीं है। शिवलिंग हमें सृष्टि की अनंतता, जीवन की क्षणभंगुरता और परम चेतना की व्यापकता का बोध कराता है। सावन की सोमवारी पर शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा भी इसी भाव से जुड़ी है कि भक्त अपने मन के अहंकार, विकार और अशुद्धियों को त्यागकर भगवान शिव के चरणों में स्वयं को समर्पित करे।
इसलिए सावन की चौथी सोमवारी केवल पूजा-अर्चना का अवसर नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, सत्य, संयम और आध्यात्मिक चेतना का पर्व भी है। शिवलिंग के समक्ष नतमस्तक होकर मनुष्य यही प्रार्थना करता है कि उसके भीतर से अहंकार का नाश हो, विवेक और सद्भाव का उदय हो तथा जीवन में सत्य, करुणा और धर्म का प्रकाश बना रहे।
हर-हर महादेव!

