*डॉ. दीपेश श्रीवास्तव ने बताया—नियमित जांच, सही ब्रशिंग और संतुलित खान-पान से अधिकांश दंत रोगों से बचाव संभव*
बलिया। आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली, अनियमित खान-पान और दांतों की सही देखभाल के प्रति लापरवाही के कारण दांतों और मसूड़ों से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। दांतों में दर्द, सड़न, मसूड़ों से खून आना, मुंह से दुर्गंध, दांतों का हिलना तथा समय से पहले टूट जाना जैसी समस्याएं अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि बच्चे और युवा भी बड़ी संख्या में इनसे प्रभावित हो रहे हैं।
इन्हीं विषयों पर मृदुला डेन्टल केयर एण्ड इम्प्लांट सेंटर, कुंवर सिंह चौराहा (पेट्रोल पम्प के सामने), बलिया के डॉक्टर दीपेश श्रीवास्तव (डेन्टल सर्जन, प्रोस्थोडॉन्टिस्ट एवं इम्प्लांटोलॉजिस्ट) से हुई विशेष बातचीत में उन्होंने दांतों की बीमारियों, उनके उपचार तथा बचाव के उपायों पर विस्तार से जानकारी दी।
डॉ. दीपेश श्रीवास्तव ने बताया कि अधिकांश लोग तब दंत चिकित्सक के पास पहुंचते हैं जब दर्द असहनीय हो जाता है, जबकि दांतों की नियमित जांच कराने से कई गंभीर समस्याओं का समय रहते पता लगाया जा सकता है। यदि हर छह महीने में एक बार दांतों की जांच कराई जाए तो छोटी-छोटी समस्याओं का इलाज आसानी से किया जा सकता है और महंगे उपचार से भी बचा जा सकता है।
उन्होंने बताया कि दांतों में कीड़ा लगना (कैविटी) सबसे आम समस्या है। मीठे खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन, ब्रश ठीक से न करना तथा मुंह की सफाई में लापरवाही इसके प्रमुख कारण हैं। शुरुआत में इसका इलाज फिलिंग द्वारा आसानी से किया जा सकता है, लेकिन लापरवाही बरतने पर रूट कैनाल या दांत निकालने की नौबत भी आ सकती है।
मसूड़ों से खून आना, सूजन और मुंह से बदबू आना भी गंभीर संकेत हो सकते हैं। डॉ. श्रीवास्तव के अनुसार यह मसूड़ों के संक्रमण का प्रारंभिक लक्षण है। समय रहते उपचार न मिलने पर मसूड़े कमजोर होने लगते हैं और दांत हिलने तक की स्थिति बन सकती है।
उन्होंने बताया कि कई लोग दांत निकल जाने के बाद वर्षों तक उसे खाली छोड़ देते हैं। इससे केवल चबाने में ही परेशानी नहीं होती बल्कि आसपास के दांत भी अपनी जगह से खिसकने लगते हैं। ऐसे मरीजों के लिए आधुनिक डेंटल इम्प्लांट एक बेहतर विकल्प है। इम्प्लांट प्राकृतिक दांत की तरह कार्य करता है और लंबे समय तक टिकाऊ रहता है।
प्रोस्थोडॉन्टिस्ट होने के नाते डॉ. दीपेश श्रीवास्तव ने कहा कि जिन लोगों के दांत टूट गए हैं या पूरी तरह निकल चुके हैं, उनके लिए आधुनिक तकनीक से कृत्रिम दांत लगाए जाते हैं, जिससे वे सामान्य रूप से भोजन कर सकते हैं और आत्मविश्वास के साथ मुस्कुरा सकते हैं।
उन्होंने बच्चों के दांतों की देखभाल पर विशेष जोर देते हुए कहा कि दूध के दांतों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। इन्हीं के आधार पर स्थायी दांत सही स्थान पर निकलते हैं। इसलिए बच्चों को बचपन से ही दिन में दो बार ब्रश करने की आदत डालनी चाहिए तथा चॉकलेट, टॉफी और मीठे पेय पदार्थों का सीमित सेवन कराना चाहिए।
डॉ. श्रीवास्तव ने बताया कि तंबाकू, गुटखा, पान मसाला और धूम्रपान केवल दांतों को ही नहीं बल्कि पूरे मुंह के स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं। इनके लगातार सेवन से मुंह के कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यदि मुंह में लंबे समय तक कोई घाव, सफेद या लाल धब्बा या गांठ दिखाई दे तो तुरंत दंत चिकित्सक से जांच करानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि गर्भवती महिलाओं, मधुमेह के मरीजों तथा बुजुर्गों को अपने दांतों और मसूड़ों की विशेष देखभाल करनी चाहिए, क्योंकि इन वर्गों में संक्रमण का खतरा अधिक रहता है।
दांतों को स्वस्थ रखने के लिए डॉ. दीपेश श्रीवास्तव की सलाह :-
👉सुबह और रात सोने से पहले कम से कम दो मिनट तक ब्रश करें।
👉मुलायम ब्रिसल वाले ब्रश का प्रयोग करें और हर तीन महीने में ब्रश बदलें।
👉भोजन के बाद कुल्ला करने की आदत डालें।
👉अत्यधिक मीठे एवं चिपचिपे खाद्य पदार्थों से बचें।
👉तंबाकू, गुटखा, पान मसाला और धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनाएं।
👉छह महीने में कम से कम एक बार दंत चिकित्सक से जांच अवश्य कराएं।
👉बच्चों के दांतों की नियमित जांच कराते रहें।
👉दांतों में दर्द, सूजन, खून आना या दुर्गंध जैसी समस्या को नजरअंदाज न करें।
अंत में डॉ. दीपेश श्रीवास्तव ने कहा, स्वस्थ दांत केवल सुंदर मुस्कान ही नहीं देते, बल्कि अच्छे स्वास्थ्य की पहचान भी हैं। छोटी-सी सावधानी और नियमित दंत परीक्षण जीवनभर दांतों को सुरक्षित रख सकता है। दांतों की समस्या को कभी भी हल्के में न लें, क्योंकि समय पर इलाज ही सबसे बड़ा बचाव है।

