31 जुलाई : पुण्यतिथि पर विशेष :-
भारतीय फिल्म संगीत के स्वर्णिम इतिहास में यदि किसी गायक की आवाज़ को अमरता का प्रतीक माना जाता है, तो वह नाम है मोहम्मद रफ़ी। अपनी मधुर, भावपूर्ण, बहुरंगी और आत्मा को छू लेने वाली गायकी से उन्होंने संगीत की दुनिया में ऐसा मुकाम बनाया, जिसे समय कभी धूमिल नहीं कर सकता। 31 जुलाई उनकी पुण्यतिथि केवल एक महान गायक को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उस संगीत साधक को श्रद्धांजलि अर्पित करने का दिन है, जिसने अपनी आवाज़ से करोड़ों लोगों के दिलों में प्रेम, भक्ति, करुणा, उल्लास और देशभक्ति के अनगिनत रंग भर दिए।
मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को पंजाब के अमृतसर ज़िले के कोटला सुल्तान सिंह गाँव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें संगीत से गहरा लगाव था। कठिन संघर्षों के बाद उन्होंने फिल्मी दुनिया में कदम रखा और धीरे-धीरे अपनी अद्भुत प्रतिभा के बल पर भारतीय सिनेमा के सबसे लोकप्रिय पार्श्वगायक बन गए। उनकी आवाज़ में ऐसी मिठास और भावनात्मक गहराई थी कि हर गीत सीधे श्रोताओं के हृदय तक पहुँच जाता था।
रफ़ी साहब की सबसे बड़ी विशेषता उनकी बहुमुखी प्रतिभा थी। उन्होंने रोमांटिक गीतों में प्रेम की कोमलता, भक्ति गीतों में आध्यात्मिक समर्पण, ग़ज़लों में संवेदनशीलता, कव्वालियों में जोश, देशभक्ति गीतों में राष्ट्रप्रेम और हास्य गीतों में सहज चंचलता का ऐसा अद्भुत समन्वय प्रस्तुत किया कि हर शैली में वे सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुए। यही कारण है कि वे हर पीढ़ी के प्रिय गायक बने रहे।
उन्होंने भारतीय सिनेमा के लगभग सभी प्रमुख अभिनेताओं के लिए अपनी आवाज़ दी। उनकी गायकी की विशेषता यह थी कि वे गीत के पात्र के भावों में स्वयं को पूरी तरह ढाल लेते थे। ऐसा लगता था मानो अभिनेता नहीं, बल्कि स्वयं वही चरित्र गा रहा हो। यही कारण है कि उनकी आवाज़ अभिनय का अभिन्न हिस्सा बन जाती थी।
मोहम्मद रफ़ी ने अपने लंबे संगीत सफर में हजारों गीत गाए, जिनमें हिंदी के अलावा पंजाबी, बंगाली, मराठी, गुजराती, भोजपुरी, उर्दू, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और कई अन्य भारतीय भाषाओं के गीत भी शामिल हैं। उनकी आवाज़ ने भाषा और क्षेत्र की सीमाओं को पार कर पूरे देश को एक संगीत सूत्र में बाँध दिया।
उनकी सादगी, विनम्रता और मानवीय व्यवहार भी उतने ही प्रेरणादायक थे, जितनी उनकी गायकी। अपार सफलता और लोकप्रियता के बावजूद उन्होंने कभी अहंकार को अपने व्यक्तित्व पर हावी नहीं होने दिया। वे नए कलाकारों का उत्साह बढ़ाते थे और संगीत को केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि साधना मानते थे। यही कारण है कि संगीत जगत में आज भी उनका नाम अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है।
भारत सरकार ने उनके असाधारण योगदान को सम्मानित करते हुए उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया। इसके अतिरिक्त उन्हें अनेक प्रतिष्ठित फिल्म पुरस्कार भी प्राप्त हुए। लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान सदैव श्रोताओं का प्रेम रहा, जो आज भी उतनी ही आत्मीयता के साथ उनके गीतों को सुनता और गुनगुनाता है।
31 जुलाई 1980 को मोहम्मद रफ़ी इस संसार से विदा हो गए, किंतु उनकी आवाज़ कभी नहीं गई। आज भी जब उनके गीत रेडियो, टेलीविज़न, मंचों या डिजिटल माध्यमों पर गूंजते हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे हमारे बीच ही मौजूद हों। उनका संगीत समय की सीमाओं से परे है और आने वाली पीढ़ियों को भी उसी तरह आनंद और प्रेरणा देता रहेगा।
आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यही कहा जा सकता है कि महान कलाकार कभी मरते नहीं, वे अपनी कला के माध्यम से सदैव जीवित रहते हैं। मोहम्मद रफ़ी केवल एक महान गायक नहीं, बल्कि भारतीय संगीत की अमूल्य धरोहर हैं। उनकी सुरमयी विरासत आने वाली अनगिनत पीढ़ियों तक संगीत प्रेमियों के हृदय में अमर रहेगी।
"स्वर भले ही मौन हो जाएँ, लेकिन महान कलाकारों की गूँज कभी समाप्त नहीं होती। मोहम्मद रफ़ी की मधुर आवाज भारतीय संगीत की आत्मा बनकर सदैव अमर रहेगी।"
चन्द्रशेखर नगर, बलिया



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