गुरु के चरणों में ही ज्ञान, संस्कार, आत्मबोध और मोक्ष का द्वार है
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल ज्ञान देने वाला शिक्षक नहीं, बल्कि वह दिव्य व्यक्तित्व है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर जीवन को सत्य, धर्म, विवेक और आत्मबोध के प्रकाश से आलोकित करता है। गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व इसी गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण व्यक्त करने का अनुपम अवसर है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य के जीवन में यदि गुरु का मार्गदर्शन न हो तो ज्ञान, संस्कार और जीवन का सही उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला गुरु पूर्णिमा पर्व महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी प्रसिद्ध है। महर्षि वेदव्यास ने वेदों का विभाजन, महाभारत जैसे विश्व के महानतम महाकाव्य की रचना तथा अठारह पुराणों का संकलन कर भारतीय ज्ञान परंपरा को अमूल्य धरोहर प्रदान की। इसी कारण उन्हें "जगतगुरु" की उपाधि से सम्मानित किया गया और उनके जन्मदिवस को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाने की परंपरा प्रारंभ हुई।
भारतीय दर्शन में कहा गया है—
"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥"
यह श्लोक गुरु की महिमा का सार प्रस्तुत करता है। गुरु ही सृजनकर्ता, पालनकर्ता और अज्ञान का नाश करने वाले शिवस्वरूप हैं। गुरु जीवन के प्रत्येक मोड़ पर दिशा दिखाते हैं और व्यक्ति को आत्मविश्वास, नैतिकता तथा कर्तव्यबोध का पाठ पढ़ाते हैं।
आज का युग विज्ञान, तकनीक और सूचना का युग है। ज्ञान प्राप्त करने के अनेक साधन उपलब्ध हैं, किन्तु सूचना और ज्ञान में बहुत बड़ा अंतर है। पुस्तकें, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमें जानकारी दे सकते हैं, परंतु जीवन जीने की कला, चरित्र निर्माण, नैतिक मूल्यों की स्थापना और आत्मानुभूति का मार्ग केवल गुरु ही प्रशस्त करते हैं। गुरु का अनुभव, उनका आशीर्वाद और उनका स्नेह ही व्यक्ति को सही निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।
भारतीय इतिहास इस बात का साक्षी है कि महान व्यक्तित्वों के पीछे किसी न किसी गुरु का मार्गदर्शन अवश्य रहा है। भगवान श्रीराम को महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र का सान्निध्य मिला, श्रीकृष्ण ने गुरु सांदीपनि से शिक्षा ग्रहण की, छत्रपति शिवाजी को समर्थ गुरु रामदास का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ और स्वामी विवेकानंद के जीवन को नई दिशा देने का कार्य श्रीरामकृष्ण परमहंस ने किया। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि गुरु केवल शिक्षा नहीं देते, बल्कि व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
वर्तमान समय में गुरु-शिष्य संबंधों में परिवर्तन अवश्य आया है, किन्तु उसकी गरिमा और महत्ता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। शिक्षकों, माता-पिता, आध्यात्मिक मार्गदर्शकों तथा समाज के उन सभी व्यक्तियों के प्रति सम्मान प्रकट करना हमारा नैतिक दायित्व है, जिन्होंने हमें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। गुरु पूर्णिमा केवल पूजा-अर्चना का पर्व नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, आत्मसंयम और गुरु के आदर्शों पर चलने का संकल्प लेने का दिवस है।
आज समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। नैतिक मूल्यों का ह्रास, बढ़ती भौतिकता, सामाजिक असंतुलन और पारिवारिक विघटन जैसी समस्याओं का समाधान केवल शिक्षा से नहीं, बल्कि संस्कारयुक्त शिक्षा से संभव है। ऐसी शिक्षा वही गुरु दे सकता है जो स्वयं आदर्श, अनुशासन और सेवा का जीवन जीता हो। इसलिए हमें अपने गुरुओं का सम्मान करते हुए उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए।
गुरु पूर्णिमा हमें यह संदेश देती है कि जीवन में सफलता केवल ज्ञान अर्जित करने से नहीं, बल्कि उस ज्ञान को सही दिशा में उपयोग करने से प्राप्त होती है। गुरु हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानते हैं और उन्हें विकसित करने की प्रेरणा देते हैं। उनका सान्निध्य जीवन को उद्देश्यपूर्ण, अनुशासित और सार्थक बनाता है।
आइए, गुरु पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर हम अपने सभी गुरुओं के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करें। उनके आदर्शों को आत्मसात करने, ज्ञान को समाजहित में उपयोग करने तथा भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की गौरवशाली विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लें। यही गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही इस महान पर्व का वास्तविक संदेश भी है।
डा. निर्भय नारायण सिंह ✍️
वरिष्ठ अधिवक्ता, बलिया



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