प्रकृति संरक्षण का सनातन संदेश : भारतीय संस्कृति और परम्परागत ज्ञान में सुरक्षित है धरती के भविष्य का मार्ग


प्रकृति संरक्षण दिवस पर विशेष :-

मानव सभ्यता का विकास प्रकृति की गोद में हुआ है। जल, जंगल, भूमि, वायु और जैव विविधता के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है। लेकिन आधुनिक विकास की अंधी दौड़, बढ़ती उपभोक्तावादी प्रवृत्ति और प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन ने पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर संकट में डाल दिया है। आज जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, बाढ़, सूखा, भूस्खलन, मरुस्थलीकरण, प्रदूषण और अनेक नई बीमारियाँ इसी असंतुलन का परिणाम हैं। प्रकृति बार-बार संकेत दे रही है कि यदि समय रहते हमने अपनी जीवनशैली नहीं बदली, तो विकास का यही मार्ग विनाश का कारण बन सकता है।

प्रकृति को बचाने का सबसे प्रभावी उपाय केवल आधुनिक तकनीक नहीं, बल्कि हमारी सनातन संस्कृति और भारतीय परम्परागत ज्ञान में भी निहित है। भारतीय संस्कृति मूलतः प्रकृति-पूजक संस्कृति है। इसे अरण्य संस्कृति और ऋषि संस्कृति भी कहा जाता है, क्योंकि यहाँ प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता और पूजनीय शक्ति के रूप में देखा गया है। हमारी परम्पराओं में धरती को माता, नदियों को देवी, पर्वतों को देवस्वरूप तथा वृक्षों और वनस्पतियों को जीवन का आधार माना गया है। यही सोच प्रकृति संरक्षण की सबसे मजबूत नींव है।

भारतीय दर्शन में पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—को संपूर्ण सृष्टि का आधार माना गया है। वेदों में वर्णित “क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर” केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का शाश्वत संदेश है। इन पाँचों तत्वों का सम्मान, संरक्षण और संतुलन ही स्वस्थ जीवन तथा सुरक्षित भविष्य की कुंजी है। जब हम इन तत्वों की पूजा करते हैं, तब वस्तुतः हम प्रकृति के संरक्षण का ही संकल्प लेते हैं।

भारतीय संस्कृति में सूर्य को ऊर्जा का स्रोत मानकर प्रतिदिन अर्घ्य देने की परम्परा है। पीपल, बरगद, नीम, तुलसी, बेल और अन्य उपयोगी वृक्षों को धार्मिक आस्था से जोड़कर उनकी रक्षा सुनिश्चित की गई। इसी प्रकार गाय, नाग, गरुड़, हंस, नंदी, सिंह, मूषक, उल्लू और अन्य जीव-जंतुओं को देवी-देवताओं के वाहन के रूप में प्रतिष्ठित किया गया, जिससे उनके संरक्षण की सामाजिक भावना विकसित हो सके। यह व्यवस्था केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि जैव विविधता की रक्षा का अत्यंत वैज्ञानिक और दूरदर्शी उपाय भी है।

भारतीय वाङ्मय—वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत, मनुस्मृति, चरक संहिता और अनेक संस्कृत ग्रंथ—प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली का संदेश देते हैं। हमारे पर्व, त्योहार, व्रत, लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें और ग्रामीण परम्पराएँ भी पर्यावरण संरक्षण के गहरे संदेशों से परिपूर्ण हैं। वृक्षारोपण, जल संरक्षण, पशु-पक्षियों के प्रति दया, नदियों की स्वच्छता और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग की भावना हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा रही है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिक विज्ञान और भारतीय परम्परागत ज्ञान का समन्वय करें। विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करे। यदि प्रत्येक व्यक्ति जल बचाने, वृक्ष लगाने, प्लास्टिक का कम उपयोग करने, जैव विविधता की रक्षा करने तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने का संकल्प ले, तो पर्यावरणीय संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि पृथ्वी केवल हमारी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की भी धरोहर है। सनातन संस्कृति का मूल संदेश “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” केवल मानव समाज तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के कल्याण का उद्घोष है। यदि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत में निहित प्रकृति संरक्षण के मूल्यों को जीवन में उतारें, तो न केवल पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, बल्कि मानव, वनस्पति और समस्त जीव-जगत के बीच संतुलित सह-अस्तित्व का मार्ग भी प्रशस्त होगा। यही प्रकृति संरक्षण का वास्तविक अर्थ है और यही मानवता के उज्ज्वल भविष्य की सबसे बड़ी गारंटी भी।

-डाॅ. गणेश पाठक (पर्यावरणविद्) पूर्व प्राचार्य एवं पूर्व शैक्षिक निदेशक जननायक चन्द्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया, (उ.प्र.)




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