भारत की आर्थिक बुलंदी के शिल्पकार : पी. वी. नरसिम्हा राव


एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसने बदल दी देश की दिशा और दशा

28 जून भारत के राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण तिथि है। इसी दिन देश के 9वें प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव का जन्म हुआ था। उन्हें आधुनिक भारत के आर्थिक परिवर्तन का प्रमुख शिल्पकार माना जाता है। उनका व्यक्तित्व केवल एक सफल प्रधानमंत्री तक सीमित नहीं था, बल्कि वे एक कुशल प्रशासक, विद्वान, बहुभाषाविद्, साहित्यकार, चिंतक और दूरदर्शी राजनेता भी थे। उन्होंने ऐसे समय में देश की बागडोर संभाली, जब भारत गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग समाप्त हो चुका था, आर्थिक विकास की रफ्तार थम गई थी और देश के सामने कठिन चुनौतियाँ खड़ी थीं। ऐसे विषम समय में उन्होंने अपने साहसिक निर्णयों और दूरदृष्टि से भारत को आर्थिक मजबूती की नई राह दिखाई।

28 जून 1921 को वर्तमान तेलंगाना के करीमनगर जनपद के वंगारा गाँव में जन्मे पी. वी. नरसिम्हा राव ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ कई भारतीय और विदेशी भाषाओं का गहन अध्ययन किया। कहा जाता है कि उन्हें एक दर्जन से अधिक भाषाओं का ज्ञान था। राजनीति के साथ-साथ साहित्य में भी उनकी गहरी रुचि थी। उन्होंने अनेक पुस्तकों का लेखन एवं अनुवाद किया और भारतीय संस्कृति, इतिहास तथा दर्शन पर गंभीर अध्ययन किया। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक सच्चा जननेता केवल सत्ता का संचालन ही नहीं करता, बल्कि ज्ञान, संवेदनशीलता और विवेक के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में भी योगदान देता है।

वर्ष 1991 में जब उन्होंने प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली, तब भारत अभूतपूर्व आर्थिक संकट से गुजर रहा था। देश के पास केवल कुछ दिनों के आयात के बराबर विदेशी मुद्रा बची थी। ऐसे कठिन दौर में उन्होंने तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के साथ मिलकर नई आर्थिक नीति लागू की। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिली। उद्योगों पर अनावश्यक नियंत्रण कम किए गए, विदेशी निवेश के लिए रास्ते खोले गए, व्यापार व्यवस्था में सुधार किए गए और आर्थिक गतिविधियों को गति प्रदान की गई। इन ऐतिहासिक निर्णयों ने भारत को विश्व अर्थव्यवस्था में नई पहचान दिलाई और विकास का नया अध्याय प्रारंभ किया।

आज भारत जिस आर्थिक शक्ति के रूप में विश्व मंच पर अपनी पहचान बना चुका है, उसकी मजबूत नींव 1991 के उन्हीं सुधारों में दिखाई देती है। सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, बैंकिंग, उद्योग, सेवा क्षेत्र और निवेश के क्षेत्र में जो व्यापक परिवर्तन हुए, उनमें पी. वी. नरसिम्हा राव की दूरदर्शिता का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए ऐसे फैसले लिए, जिनके सकारात्मक परिणाम आने वाले दशकों तक देश को मिलते रहे।

प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल केवल आर्थिक सुधारों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने विदेश नीति को नई दिशा दी, "लुक ईस्ट पॉलिसी" की शुरुआत की, विज्ञान एवं तकनीक को प्रोत्साहन दिया और भारत के वैश्विक संबंधों को मजबूत करने का प्रयास किया। शिक्षा, प्रशासन और सुशासन के क्षेत्र में भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण पहल कीं। वे शांत स्वभाव, गंभीर चिंतन और कम बोलकर अधिक काम करने वाले नेता के रूप में जाने जाते थे। उनकी कार्यशैली ने यह सिद्ध किया कि प्रभावी नेतृत्व के लिए शोर नहीं, बल्कि स्पष्ट दृष्टि और मजबूत निर्णय क्षमता आवश्यक होती है।

पी. वी. नरसिम्हा राव का जीवन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में धैर्य, विवेक और साहस का परिचय देते हुए राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। ज्ञान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता, प्रशासनिक दक्षता और दूरदर्शी सोच आज भी सार्वजनिक जीवन में कार्य करने वाले लोगों के लिए अनुकरणीय है। उन्होंने यह संदेश दिया कि सच्चा नेतृत्व वही है जो संकट को अवसर में बदलने का साहस रखता हो और आने वाली पीढ़ियों के लिए विकास का मजबूत आधार तैयार करे।

उनकी जयंती पर देश कृतज्ञता के साथ उस महान राजनेता को स्मरण करता है, जिसने भारत की आर्थिक तस्वीर बदलने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनका योगदान भारतीय लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र निर्माण के इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। राष्ट्र उनके आदर्शों, दूरदृष्टि और सेवा भावना को नमन करता है तथा उनके दिखाए मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प दोहराता है।

पंडित विजेंद्र शर्मा ✍️ 

जीरा बस्ती, बलिया (उ.प्र.)



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