घटता भू-जल स्तर : बढ़ते जल संकट का गंभीर संकेत : डॉ. गणेश पाठक



10 जून, विश्व भू-जल दिवस पर विशेष :-

"जल है तो कल है, जल है तो जीवन है।" यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व का आधार है। पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता जल पर निर्भर करती है। भारतीय संस्कृति में भी जल को पंचमहाभूतों में स्थान दिया गया है—

क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर।

पंच तत्व यह बना शरीर।।

अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु से ही जीवन का निर्माण हुआ है। इनमें से किसी एक तत्व की कमी भी जीवन के लिए संकट उत्पन्न कर सकती है। जल इन पांच तत्वों में सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक है, किंतु आज यही अमूल्य संसाधन गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है।

मानव की बढ़ती भोगवादी प्रवृत्ति, अनियंत्रित शहरीकरण, औद्योगीकरण तथा भू-जल के अंधाधुंध दोहन ने जल संकट को वैश्विक समस्या बना दिया है। जल का अनियोजित उपयोग और बढ़ता प्रदूषण प्राकृतिक जल स्रोतों को तेजी से प्रभावित कर रहा है। यही कारण है कि जल संरक्षण आज विश्व समुदाय की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है।

इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए वर्ष 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में जल संरक्षण को वैश्विक एजेंडे में शामिल किया गया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 22 दिसंबर 1992 को प्रस्ताव पारित कर प्रतिवर्ष 22 मार्च को विश्व जल दिवस मनाने का निर्णय लिया। इसी क्रम में 10 जून को विश्व भू-जल दिवस मनाकर भू-जल संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया जाता है।

भू-जल संकट क्यों बन रहा है चिंता का विषय?

पृथ्वी पर उपलब्ध कुल जल का लगभग 97 प्रतिशत भाग खारा है। केवल लगभग 3 प्रतिशत जल ही मीठा है और उसमें भी मात्र 0.3 प्रतिशत जल ही मानव उपयोग के लिए आसानी से उपलब्ध है। बढ़ती जनसंख्या और संसाधनों की बढ़ती मांग के बीच यह उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है।

भारत विश्व की लगभग 18 प्रतिशत आबादी का घर है, लेकिन उसके पास विश्व के कुल जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत हिस्सा है। यही असंतुलन देश में जल संकट की गंभीरता को दर्शाता है। भारत में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता वर्ष 1951 में लगभग 5200 घन मीटर थी, जो लगातार घटते हुए आज जल-संकट की सीमा के निकट पहुंच गई है।

सबसे अधिक चिंता का विषय भू-जल का अत्यधिक दोहन है। वैश्विक भू-जल निकासी का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा अकेले भारत द्वारा उपयोग किया जाता है। देश में पेयजल की लगभग 80 प्रतिशत और सिंचाई की 60 प्रतिशत से अधिक आवश्यकता भू-जल से पूरी होती है। परिणामस्वरूप अनेक क्षेत्रों में भू-जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है।

भविष्य की भयावह तस्वीर

संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार वर्तमान में विश्व की लगभग 40 प्रतिशत आबादी जल की कमी से प्रभावित है। वर्ष 2050 तक यह संख्या 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। आज भी लगभग 2 अरब लोगों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है और 3.6 अरब लोग पर्याप्त स्वच्छता सुविधाओं से वंचित हैं।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक जल संकट के कारण लगभग 70 करोड़ लोगों को विस्थापन का सामना करना पड़ सकता है। वहीं 2040 तक दुनिया का हर चौथा बच्चा अत्यधिक जल तनाव वाले क्षेत्रों में रहने को विवश होगा। जल की कमी केवल पेयजल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक विकास और सामाजिक स्थिरता पर भी गंभीर प्रभाव डालेगी।

भारत में बढ़ती चुनौती

भारत में तीव्र शहरीकरण, औद्योगिक विस्तार और कृषि क्षेत्र में भू-जल पर बढ़ती निर्भरता ने संकट को और गहरा कर दिया है। बेंगलुरु सहित कई बड़े शहर जल संकट के गंभीर संकेत दे चुके हैं। जल की मांग निरंतर बढ़ रही है, जबकि प्राकृतिक स्रोतों का पुनर्भरण अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पा रहा है।

इसके अतिरिक्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डेटा सेंटर और आधुनिक तकनीकों के विस्तार के साथ जल की खपत में भी वृद्धि हो रही है, जो भविष्य में जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।

जल संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन ही समाधान

बढ़ते जल संकट से निपटने का सबसे प्रभावी उपाय जल संरक्षण और वैज्ञानिक जल प्रबंधन है। इसके लिए वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना, भू-जल पुनर्भरण की व्यवस्था करना, जल प्रदूषण रोकना, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई को अपनाना तथा जल के विवेकपूर्ण उपयोग को जीवनशैली का हिस्सा बनाना आवश्यक है।

साथ ही, प्रत्येक नागरिक को जल बचाने की जिम्मेदारी समझनी होगी। घरों, खेतों और उद्योगों में जल की बर्बादी रोकना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। बूंद-बूंद जल का संरक्षण ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकता है।

जन-जागरूकता ही सफलता की कुंजी

विश्व भू-जल दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि यह हमें जल के महत्व और उसकी सीमित उपलब्धता का स्मरण कराता है। यदि आज हमने जल संरक्षण को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया, तो आने वाले वर्षों में जल संकट मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।

आइए, विश्व भू-जल दिवस पर हम सभी संकल्प लें कि जल का संरक्षण करेंगे, भू-जल के अनावश्यक दोहन को रोकेंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएंगे।

डॉ. गणेश पाठक ✍️ 








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