विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत और उद्देश्य
जब विश्व के वैज्ञानिकों, विचारकों, विद्वानों, चिंतकों, विभिन्न देशों के राजनायिकों, राष्ट्राध्यक्षों एवं पर्यावरणविदों ने देखा कि यह हरी-भरी धरा धीरे-धीरे विरान होती जा रही है, प्राकृतिक संसाधन समाप्त होते जा रहे हैं एवं विकास की अंधी दौड़ में सम्पूर्ण विश्व भागता जा रहा है। किसी को यह चिंता नहीं है कि वह पृथ्वी, जो हमें सब कुछ प्रदान करती है, उसी को हम विनष्ट करने पर तुले हुए हैं। इन्हीं तथ्यों को मद्देनजर रखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा पहली बार 1972 में स्टाॅकहोम में पर्यावरण पर एक सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें विश्व के अधिकांश देशों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में 'संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम' (यू एन ई पी) नामक संगठन की स्थापना भी की गयी और 5 जून, 1973 को सर्व प्रथम एक साथ पूरे विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया गया तथा प्रति वर्ष 5 जून को 'विश्व पर्यावरण दिवस' मनाने सका निर्णय लिया गया। तब से आज तक प्रति वर्ष कोई न कोई विशेष उद्देश्य को निर्धारित कर उसके अनुसार पर्यावरण संरक्षण हेतु पूरे वर्ष भर के लिए कार्यक्रम निर्धारित किए जाते हैं एवं जन-जागरूकता फैलाई जाती है। प्रति वर्ष 5 जून को 150 से अधिक देश एक साथ पर्यावरण दिवस मनाते हैं एवं पर्यावरण संरक्षण हेतु कार्यक्रम चलाकर जागरूकता उत्पन्न की जाती है। संयुक्त राष्ट्र का विचार है कि मानव पर्यावरण का संरक्षण एवं सुधार एक मुख्य मुद्दा है, जो विश्व भर के लोगों के हितार्थ एवं आर्थिक विकास को प्रभावित करता है।
उपर्युक्त तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए हुए ही इस वर्ष अर्थात् 2026 के लिए पर्यावरण दिवस का मुख्य उद्देश्य (थीम) "प्रकृति से प्रेरित, जलवायु के लिए, हमारे भविष्य के लिए"। अर्थात् इस वर्ष का पर्यावरण दिवस का मुख्य उद्देश्य "प्रकृति से प्रेरित होकर जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध तात्कालिक कारवाई करते हुए एक स्थाई एवं सुरक्षित भविष्य का निर्माण करना" है। 2026 के वैश्विक पर्यावरण दिवस की मेजबानी अज़रबैजान द्वारा बाकू में 5 जून को की जायेगी। बाकू से पूरे विश्व में यह संदेश जायेगा कि यदि हमें और आगे आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित भविष्य का निर्माण करना है तो हमें प्रकृति को बचाना होगा। यदि प्रकृति बचेगी तभी जलवायु परिवर्तन पर रोकथाम लगेगी और तभी हमारा भविष्य सुरक्षित रह पायेगा।
यदि हम पर्यावरण विनाश की दृष्टि से पृथ्वी को देखें तो यह पता चलता है कि हमें सब कुछ देने वाली धरती मां आज अपने अस्तित्व को बचाने के लिए खुद कराह रही है। आइए देखते हैं कि हमने अब तक पर्यावरण के साथ किस तरह का कितना खिलवाड़ किए हैं और उसका हमें कितना नुकसान भुगतना पड़ रहा है।
हम जानते हैं कि मानव इस सृष्टि का सबसे महत्वपूर्ण एवं क्रियाशील प्राणी है। वह स्वयं एक विशेष सर्वश्रेष्ठ संसाधन हैं एवं संसाधन निर्माणकर्ता भी है। मानव अपने विकास हेतु सतत् क्रियाशील रहा है एवं अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रकृति का सतत् दोहन एवं शोषण करता रहा है। प्रकृति में निहित सभी सम्भावनाओं का मानव द्वारा भरपूर उपभोग किया गया। प्राकृतिक संसाधनों में वनों का तेजी से विनाश किया गया। विश्व में प्रतिवर्ष औसतन 47 लाख हेक्टेयर जंगलों का विनाश हो रहा है। 10,000 वर्ष पू्र्व धरती के 600 करोड़ हेक्टेयर भू-भाग पर जंगल था। वर्तमान समय में मात्र 400 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र पर ही जंगल बचा है। 2015 से 2020 के दौरान प्रतिवर्ष 1 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र से जंगल का सफाया हुआ है। स्थलीय प्रजातियों का 80 प्रतिशत हिस्सा जंगलों में ही रहता है। जंगल कटने से इन स्थलीय प्रजातियों पर संकट के बादल मॅडराने लगे हैं एवं अनेक प्रजातियां विलुप्त होती जा रही हैं। आइयूसीएन के रेड डाटा बुक के अनुसार 142,500 प्रजातियों में से 40,000 के विलुप्त होने का खतरा है, जो ज्ञात प्रजातियों का 28 प्रतिशत हिस्सा है। धरती से 900 प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं, जिनमें से पक्षी, स्तनधारी, मछलियों, उभयचरों एवं सरीसृप की क्रम: 159, 85, 80, 35 एवं 30 प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। विगत 50 वर्षों के दौरान मानव खपत, नगरीकरण, जनसंख्या वृद्धि एवं व्यापार वृद्धि के कारण जानवरों की संख्या में 70 प्रतिशत की कमी आई है।
ग्रीन हाउस प्रभाव एवं ओजोन परत क्षरण से धरती पर वैश्विक तापन का खतरा उत्पन्न हो गया है। तापवृद्धि के कारण जलवायु परिवर्तन में तेजी से वृद्धि हो रही है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हमारी कृषि व्यवस्था पर विशेष रूप से पड़ रहा है, जिससे उत्पादन एवं उत्पादकता दोनों में कमी आ रही है। जल स्रोतों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। मौसम में तेजी से बदलाव आ रहा है। बिमारियों में वृद्धि हो रही है। स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है एवं इसका प्रभाव हमारे दैनिक जीवन पर भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
उपर्युक्त परिस्थितियों के चलते प्रकृति में असंतुलन की स्थिति उत्पन्न होने लगी है, जिसके चलते हमारा सम्पूर्ण पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित होता जा रहा है। मानव द्वारा किया गया अनियोजित एवं अनियंत्रित विकास अब विनाश की तरफ अग्रसर हो रहा है, जो अब हमें विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं एवं बीमारियों के रूप में परिलक्षित होने लगा है।
हमारा पर्यावरण एक वृद्ध मशीन की तरह है एवं समस्त पेड़- पौधे व प्राणी जगत इसके जीवन के पेंच एवं पूर्जे हैं। मानव की भोगवादी प्रवृत्ति एवं विलासितापूर्ण जीवन के चलते पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी में इतना अधिक असंतुलन उत्पन्न होता जा रहा है कि न केवल मानव जीवन, अपितु सम्पूर्ण पादप जगत एवं जीव-जंतु जगत का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा है। कारण कि हमारे सभी प्राकृतिक संसाधन-वन, भूमि जल, जीव, वायु, खनिज आदि समाप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं। जो बचे हैं, वो इतने प्रदूषित हो गए हैं कि मानव के जीवन, स्वास्थ्य एवं कल्याण स्रोतों के समक्ष अस्तित्व का संकट उत्पन्न हो गया है। प्रकृति में हो रहे असंतुलन के कारण धरती का जीवन-चक्र भी समाप्त होता नजर आ रहा है। प्रकृति के बढ़ते असंतुलन के कारण बाढ़, सूखा, भू-स्खलन, मृदा अपरदन, मरूस्थलीयकरण, भूकम्प, ज्वालामुखी, सुनामी, ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन जैसी प्राकृतिक आपदाएं उत्पन्न होकर हमारा अस्तित्व मिटाने पर तत्पर हैं।
इसके अतिरिक्त अनेक मानव जनित आपदाएं, जैसे - भू- स्खलन, भू-अपरदन, बाढ़, परिवहन दुर्घटनाएं, आतंकवाद, तकनीक आपदाएं, रासायनिक आपदाएं, परमाणु विस्फोट, जनसंख्या विस्फोट, कुपोषण, जैविक बीमारियां आदि भी भयंकर रूप धारण कर मानव के ही अस्तित्व को मिटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं एवं "हम ही शिकारी, हम ही शिकार" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है।
प्रश्न यह उठता है कि आखिर मानव के समक्ष उत्पन्न संकट एवं प्राकृतिक असंतुलन को को कैसे रोका जाय, जिससे कि पृथ्वी के अस्तित्व को विनष्ट होने से बचाया जा सके।
यह भी सत्य है कि हम विकास को भी नहीं रोक सकते। ऐसे में हमें एक ही रास्ता दिखाई देता है कि यदि हम सनातन संस्कृति एवं भारतीय परम्परागत ज्ञान परम्परा में निहित अवधारणाओं के अनुसार प्रकृति के साथ व्यवहार करें, उसके अनुसार अपनी जीवन शैली एवं जीवन चर्या को अपनाएं तो निश्चित ही हम प्रकृति को बचा सकते हैं, प्रदूषण को भी भगा सकते हैं एवं पर्यावरण तथा पारिस्थितिकी संतुलन भी बनाए रख सकते हैं। क्यों कि सनातन संस्कृति अर्थात् हमारी भारतीय संस्कृति में प्रकृति संरक्षण की मूल संकल्पना छिपी हुई है। भारतीय संस्कृति अरण्य संस्कृति एवं प्रकृतिपूजक संस्कृति है, जिसमें हम प्रकृति के सभी कारकों में देवी- देवताओं का वास मानकर उनकी पूजा करते हैं। भारतीय संस्कृति में प्रकृति के पांच मूल-भूत तत्वों-धरती, जल, अग्नि, आकाश एवं वायु की पूजा का विधान बनाया गया है। ऊर्जा के अजस्र स्रोत 'सूर्य' की भी हम पूजा करते हैं। सभी उपयोगी वृक्षों पर भी देवी-देवता का वास मानकर उनकी पूजा का विधान बताया गया है, ताकि उनकी रक्षा हो सके। सभी जीव- जंतुओं को देवी-देवता का वाहन बना दिया गया है, जिससे कि जीव-जंतुओं को कोई नुक्सान न पहुंचा सके।
हम भगवान की पूजा करते हैं और भगवान में पांच शब्द है- भ, ग, व, अ एवं न, जिनका मतलब होता है क्रमश: भूमि,गगन, वायु, अग्नि एवं नीर। अर्थात प्रकृति के जो पांच मूल-भूत तत्व हैं - " क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर", इन्हीं पांच तत्वों की पूजा हम भगवान के रूप में करते हैं। मानवोपयोगी एवं प्रकृति संरक्षण से जुड़ी ऐसी अवधारणाएं विश्व में कहीं नहीं मिलती हैं।
ये सभी अवधारणाएं हमारे भारतीय वांगमय-वेद, पुराण, उपनिषद, ब्राह्मण ग्रंथ, मनुस्मृति, चरक संहिता, धर्मसूत्र, रामायण, महाभारत सहित अनेक ग्रंथों में भरी पड़ी हैं। यही नहीं यदि हम भारतीय परम्परागत ज्ञान परम्परा को देखें तो हमारे परम्परागत ज्ञान परम्परा में ऐसी मानवोपयोगी एवं प्रकृति संरक्षण संबंधी अवधारणाएं निहित हैं, जिनका अनुपालन कर मानव न केवल अपना हितलाभ कर सकता है, बल्कि प्रकृति एवं पर्यावरण की सुरक्षा एवं संरक्षा करने में भी अहम् भूमिका निभा सकता है। हमारे जो भी रीतिरिवाज, परम्पराएं, प्रथाएं, उत्सव, त्यौहार, कहावतें, लोकोक्तियां एवं लोकगीत हैं, सबमें ऐसी विचारधाराओं का समावेश है, जिनका अनुसरण कर मानव न केवल अपना भला कर सकता है, बल्कि पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी अर्थात् सम्पूर्ण प्रकृति की रक्षा कर पादप जगत एवं जीव-जंतु जगत की रक्षा कर अपना संतुलित विकास करते हुए "सर्वे भवन्तु सुखिन, सर्वे संतु निरामया" एवं "वसुधैव कुटुम्बकम्" की उद्दात भावना से संपृक्त होकर न केवल भारत, बल्कि विश्व के कल्याण के लिए भी अग्रसर होगा।
डाॅ. गणेश पाठक ✍️
पर्यावरणविद्
पूर्व प्राचार्य, अमर नाथ मिश्र पीजी कालेज, बलिया



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