भारत में ग्रीष्म ऋतु के सबसे तप्त और चुनौतीपूर्ण दिनों की शुरुआत आज से हो गई है। सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते ही नौ दिनों तक चलने वाले विशेष काल “नौतपा” का आरंभ माना जाता है। “नौतपा” शब्द का अर्थ ही है — नौ दिनों तक पड़ने वाली तीव्र तपन। ज्योतिष, कृषि और लोकजीवन में इसका विशेष महत्व माना गया है। इस दौरान सूर्य की किरणें पृथ्वी पर सीधे और अधिक प्रभावी रूप से पड़ती हैं, जिससे तापमान तेजी से बढ़ता है और वातावरण में भीषण गर्मी का एहसास होता है। उत्तर भारत सहित कई राज्यों में नौतपा शुरू होते ही लू, तेज धूप और गर्म हवाओं का असर दिखाई देने लगा है।
भारतीय परंपरा और लोकमान्यताओं में नौतपा को केवल गर्मी का समय नहीं बल्कि प्रकृति के संतुलन का महत्वपूर्ण चरण माना गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में कहा जाता है कि “जितना तपे नौतपा, उतनी अच्छी वर्षा।” किसानों का मानना है कि यदि नौतपा के नौ दिनों में अच्छी गर्मी पड़ती है तो मानसून मजबूत होता है और खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं। तेज गर्मी धरती की नमी को संतुलित करती है तथा वातावरण में ऐसा दबाव बनाती है जो मानसून की गति को प्रभावित करता है। यही कारण है कि कृषि प्रधान भारत में नौतपा को मौसम परिवर्तन के महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जाता है।
नौतपा से जुड़ी कई पारंपरिक मान्यताएं और लोककथाएं भी प्रचलित हैं। कई स्थानों पर लोग इस अवधि में जलदान, छायादान और अन्नदान को पुण्य कार्य मानते हैं। गांवों और कस्बों में राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना, पक्षियों के लिए पानी रखना और जरूरतमंदों को शरबत बांटना भारतीय संस्कृति की मानवीय परंपरा को दर्शाता है। धार्मिक दृष्टि से भी यह समय संयम, धैर्य और सेवा भावना का प्रतीक माना गया है। कई लोग इस दौरान तामसिक भोजन से बचते हैं और शरीर को ठंडा रखने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो नौतपा का संबंध पृथ्वी, सूर्य और वातावरण की स्थिति से है। इस समय सूर्य की सीधी किरणों के कारण जमीन अत्यधिक गर्म हो जाती है। इससे गर्म हवाएं यानी लू चलती हैं। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार यह गर्मी मानसून से पहले वातावरण में आवश्यक बदलाव लाने का कार्य करती है। यदि नौतपा के दौरान बीच-बीच में अधिक बारिश हो जाए या तापमान सामान्य से कम रहे तो मानसून कमजोर पड़ने की संभावना भी मानी जाती है। हालांकि आधुनिक मौसम विज्ञान इसे कई अन्य वैश्विक कारकों से भी जोड़कर देखता है।
नौतपा के दौरान स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी तेजी से बढ़ जाती हैं। अत्यधिक गर्मी और लू के कारण हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, चक्कर आना, सिरदर्द, उल्टी, थकान और त्वचा संबंधी रोग होने का खतरा बढ़ जाता है। विशेष रूप से छोटे बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और हृदय या श्वास संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। लंबे समय तक धूप में रहने से शरीर का तापमान असंतुलित हो सकता है, जिससे गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने लोगों को नौतपा के दौरान पर्याप्त मात्रा में पानी पीने की सलाह दी है। नींबू पानी, बेल का शरबत, आम पन्ना, छाछ, लस्सी, नारियल पानी और मौसमी फलों का सेवन शरीर को ठंडक पहुंचाने में सहायक होता है। दोपहर के समय बिना जरूरी काम के बाहर निकलने से बचना चाहिए। बाहर निकलते समय सिर को कपड़े, टोपी या छाते से ढंकना चाहिए तथा हल्के रंग और सूती कपड़े पहनने चाहिए। अत्यधिक तला-भुना और मसालेदार भोजन कम करना चाहिए। घरों में पशु-पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करना भी इस समय मानवीय जिम्मेदारी मानी जाती है।
नौतपा का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता बल्कि इसका असर जनजीवन, बिजली व्यवस्था और जलसंकट पर भी पड़ता है। बढ़ती गर्मी के कारण बिजली की मांग तेजी से बढ़ती है, जिससे कई क्षेत्रों में बिजली कटौती की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जल स्रोतों का स्तर कम होने लगता है और पानी की किल्लत बढ़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जल संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता ही भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि लगातार बढ़ते तापमान, कटते जंगल और प्रदूषण के कारण नौतपा का प्रभाव पहले की तुलना में अधिक तीव्र महसूस होने लगा है। ऐसे में अधिक से अधिक वृक्षारोपण, जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन बनाए रखना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। नौतपा हमें यह संदेश देता है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर ही मानव जीवन सुरक्षित और स्वस्थ रह सकता है। सावधानी, संयम और जागरूकता के साथ इस कठिन मौसम का सामना किया जा सकता है।
डॉ. जनार्दन चतुर्वेदी "कश्यप"राजपूत नेवरी, भृगु आश्रम, बलिया (उ.प्र.)
मो. नं.- 9935108535



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