बरसाना की लठमार होली : आस्था, परंपरा और उल्लास का अद्भुत संगम


फाल्गुन मास की मादक फिज़ाओं में जब रंगों की बौछार होती है, तब 25 फरवरी को ब्रजभूमि के हृदय बरसाना में खेली जाने वाली लठमार होली अपने चरम पर होती है। यह केवल रंगों का पर्व नहीं, बल्कि भक्ति, लोकपरंपरा और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव है, जिसे देखने और अनुभव करने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु और पर्यटक उमड़ पड़ते हैं।

बरसाना, जहां राधा जी का जन्म माना जाता है, वहीं से लठमार होली की अनोखी परंपरा जुड़ी है। मान्यता है कि होली के अवसर पर नंदगांव से भगवान कृष्ण अपने सखाओं के साथ बरसाना आते हैं और राधा जी व उनकी सखियों से हंसी-ठिठोली करते हैं। इसी प्रेम-परिहास की स्मृति में आज भी यह परंपरा निभाई जाती है, जहां बरसाना की महिलाएं हाथों में लाठियां लेकर नंदगांव से आए पुरुषों पर प्रतीकात्मक प्रहार करती हैं और पुरुष ढाल से स्वयं का बचाव करते हैं।

लठमार होली के दिन बरसाना की गलियां रंग, गुलाल और अबीर से सराबोर हो जाती हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप, होली के रसिया गीत और “राधे-राधे” के जयघोष से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजी-धजी लाठियां थामे होती हैं, जबकि पुरुष टोली बनाकर राधा रानी के मंदिर की ओर बढ़ते हैं। यह दृश्य जितना रोचक होता है, उतना ही आध्यात्मिक भाव से ओत-प्रोत भी।

लठमार होली केवल एक लोकनाट्य नहीं, बल्कि नारी सशक्तिकरण और सामाजिक समरसता का प्रतीक भी मानी जाती है। यहां स्त्रियां उत्सव की नायिका होती हैं और पुरुष सहर्ष इस परंपरा का हिस्सा बनते हैं। इसमें किसी प्रकार की हिंसा नहीं, बल्कि हास्य, प्रेम और परस्पर सम्मान की भावना निहित रहती है।

बरसाना की लठमार होली ब्रज संस्कृति की आत्मा को जीवंत करती है। यह पर्व हमें बताता है कि परंपराएं केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान को रंगों से भरने वाली जीवित चेतना हैं। 25 फरवरी को जब बरसाना की धरती पर गुलाल उड़ता है, तब हर रंग प्रेम, भक्ति और आनंद का संदेश देता है—यही लठमार होली की सच्ची पहचान है।




Post a Comment

0 Comments