भारतीय सनातन संस्कृति में भगवान श्री विश्वकर्मा को सृष्टि के प्रथम शिल्पकार, देवताओं के वास्तुकार तथा सम्पूर्ण सृजनात्मक ऊर्जा के अधिष्ठाता देव के रूप में पूजित किया जाता है। वे केवल भवनों, नगरों और यंत्रों के निर्माता ही नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को आकार देने वाले दिव्य शिल्पज्ञान के स्रोत हैं। भगवान श्री विश्वकर्मा का जन्मोत्सव प्रत्येक वर्ष श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता के भाव के साथ मनाया जाता है, जो श्रम, कौशल और सृजनशीलता के प्रति समाज की आस्था को अभिव्यक्त करता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए स्वर्गलोक, इन्द्रपुरी, भगवान श्रीकृष्ण के लिए द्वारका नगरी, लंका की स्वर्णमयी नगरी, पुष्पक विमान, देवताओं के दिव्य अस्त्र-शस्त्र तथा अनेक अद्भुत यंत्रों का निर्माण किया। उनकी रचनाएँ केवल स्थापत्य के उदाहरण नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान और आध्यात्मिक चेतना का संगम हैं। यही कारण है कि उन्हें ‘वास्तुशास्त्र’, ‘यंत्रशास्त्र’ और ‘शिल्पकला’ का जनक माना गया है।
भगवान विश्वकर्मा श्रम की गरिमा और कौशल की श्रेष्ठता के प्रतीक हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सृजन ही मानव की सबसे बड़ी शक्ति है और परिश्रम से ही समाज एवं राष्ट्र का निर्माण होता है। कारीगर, अभियंता, वास्तुकार, लोहार, बढ़ई, मशीन ऑपरेटर, तकनीकी श्रमिक एवं उद्योग जगत से जुड़े लोग इस दिन विशेष पूजा-अर्चना कर अपने औजारों, मशीनों और कार्यस्थलों का पूजन करते हैं। यह परंपरा श्रम के सम्मान और आत्मनिर्भरता की भावना को मजबूत करती है।
वर्तमान युग में जब तकनीक, उद्योग और अधोसंरचना विकास राष्ट्र निर्माण की रीढ़ बन चुके हैं, तब भगवान विश्वकर्मा की शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हो जाती हैं। ‘मेक इन इंडिया’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और कौशल विकास जैसे अभियानों के मूल में वही विचार निहित है, जिसे भगवान विश्वकर्मा ने युगों पहले स्थापित किया था—सृजन, नवाचार और आत्मबल।
भगवान श्री विश्वकर्मा जन्मोत्सव हमें यह प्रेरणा देता है कि हम अपने कार्य को ईश्वर की आराधना समझकर करें, गुणवत्ता और ईमानदारी को सर्वोपरि रखें तथा समाज के विकास में अपनी भूमिका को पहचानें। यह पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि कर्म, कौशल और कर्तव्य के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
अंततः भगवान श्री विश्वकर्मा का जन्मोत्सव हमें यह स्मरण कराता है कि सृजन ही सभ्यता की आत्मा है और श्रम ही प्रगति का आधार। आइए, इस पावन अवसर पर हम सब उनके आदर्शों को आत्मसात करते हुए एक सशक्त, सृजनशील और समृद्ध समाज के निर्माण का संकल्प लें।
जय श्री विश्वकर्मा।
परिवर्तन चक्र समाचार सेवा ✍️


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