हर वर्ष 29 जनवरी को मनाया जाने वाला भारतीय समाचार पत्र दिवस केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि यह उस संघर्ष, साहस और समर्पण का स्मरण है, जिसने भारत को सच बोलने की ताकत दी। यह वही दिन है जब 1780 में देश के पहले समाचार पत्र ‘हिक्की’s गजट’ का प्रकाशन हुआ और भारत में विचारों की आज़ादी की पहली चिंगारी जली।
समाचार पत्र केवल कागज़ पर छपी स्याही नहीं होते, वे समाज की धड़कन होते हैं। वे उन आवाज़ों को मंच देते हैं, जो अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। किसी गांव के किसान की पीड़ा हो, किसी मजदूर का संघर्ष हो या सत्ता के गलियारों में पल रहे भ्रष्टाचार का सच—समाचार पत्र हर दौर में सच के साथ खड़े रहे हैं।
जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था, तब समाचार पत्र ही थे जिन्होंने जनता को झकझोरा। अंग्रेज़ी हुकूमत की कठोर सेंसरशिप, जेल और यातनाओं के बावजूद पत्रकारों ने कलम नहीं झुकाई। ‘केसरी’, ‘यंग इंडिया’, ‘नवजीवन’ जैसे पत्रों ने आज़ादी की लौ को बुझने नहीं दिया। उस दौर में अख़बार पढ़ना भी एक आंदोलन था और उसे छापना एक बलिदान।
आज भी पत्रकारिता आसान नहीं है। सच लिखने की कीमत कई बार अपमान, दबाव और खतरे के रूप में चुकानी पड़ती है। फिर भी हर सुबह अख़बार पाठकों तक पहुँचता है, क्योंकि कहीं कोई पत्रकार रात भर जागकर समाज के लिए सच तलाशता रहता है। यह समर्पण ही समाचार पत्रों को खास बनाता है।
डिजिटल युग में सूचनाएँ तेज़ हैं, लेकिन अक्सर अधूरी और भ्रामक भी। ऐसे समय में समाचार पत्र ठहराव, गहराई और विश्वास का प्रतीक बने हुए हैं। अख़बार न केवल खबर देते हैं, बल्कि सोचने की दिशा भी देते हैं। वे पाठक को सवाल करना सिखाते हैं और लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं।
भारतीय समाचार पत्र दिवस उन अनगिनत पत्रकारों को नमन करने का दिन है, जिनकी पहचान अक्सर नामों से नहीं, खबरों से होती है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि जब तक निष्पक्ष पत्रकारिता जीवित है, तब तक समाज अंधकार में नहीं जाएगा।
आज आवश्यकता है कि हम सच के साथ खड़े हों, जिम्मेदार पत्रकारिता को सम्मान दें और उस कलम की ताकत को समझें, जिसने सदियों से समाज को आईना दिखाया है।
क्योंकि—जब कलम बोलती है, तब इतिहास बनता है।और जब कलम खामोश होती है, तब लोकतंत्र कांपता है।


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