विश्व हिंदी दिवस : भाषा नहीं, एक जीवंत संस्कृति और वैश्विक संवाद का सशक्त माध्यम


विश्व हिंदी दिवस प्रतिवर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है। यह दिन केवल एक भाषा के उत्सव का दिन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और वैश्विक संवाद की उस सशक्त धारा का प्रतीक है, जिसने हिंदी को विश्व पटल पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई है। 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित पहले विश्व हिंदी सम्मेलन की स्मृति में यह दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करना और इसके प्रचार-प्रसार को नई दिशा देना था। आज, जब दुनिया एक वैश्विक गाँव बन चुकी है, हिंदी भी सीमाओं से निकलकर विश्व की प्रमुख भाषाओं में अपना स्थान बना रही है।

हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति है। इसमें हमारी लोकसंस्कृति, लोकगीत, लोककथाएँ, रीति-रिवाज और सामाजिक चेतना समाहित हैं। यह भाषा सदियों से जन-जन की भावनाओं की वाहक रही है। कबीर की निर्भीक वाणी, तुलसीदास की भक्ति-भावना, प्रेमचंद की सामाजिक संवेदना और महादेवी वर्मा की करुणा—इन सबने हिंदी को केवल साहित्यिक नहीं, बल्कि नैतिक और सांस्कृतिक शक्ति प्रदान की है। हिंदी साहित्य ने समाज को नई दृष्टि दी है और मानवता के मूल्यों को सुदृढ़ किया है।

विश्व हिंदी दिवस हमें यह भी स्मरण कराता है कि भाषा राष्ट्र की पहचान होती है। हिंदी ने स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राष्ट्रभाषा के रूप में भले ही हिंदी का संवैधानिक दर्जा न हो, पर राजभाषा के रूप में यह देश के प्रशासन, शिक्षा, न्याय और मीडिया में एक सेतु की तरह कार्य करती है। आज भी देश के कोने-कोने में हिंदी विभिन्न बोलियों और रूपों में जीवंत है—अवधी, ब्रज, भोजपुरी, बुंदेली, मैथिली, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी जैसी बोलियाँ हिंदी को और समृद्ध बनाती हैं।

आज का युग तकनीक का युग है और हिंदी इस क्षेत्र में भी तेज़ी से आगे बढ़ रही है। इंटरनेट पर हिंदी कंटेंट की संख्या लगातार बढ़ रही है। सोशल मीडिया, यूट्यूब, ब्लॉग्स, पॉडकास्ट और ई-लर्निंग प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी में ज्ञान, मनोरंजन और सूचना का भंडार उपलब्ध है। सरकारी सेवाओं से लेकर निजी कंपनियों तक, हिंदी अब ग्राहक सेवा, डिजिटल मार्केटिंग और ई-कॉमर्स की भी महत्वपूर्ण भाषा बन चुकी है। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि हिंदी अब केवल साहित्य और भावनाओं की भाषा नहीं, बल्कि आधुनिक समय की व्यावसायिक और तकनीकी भाषा भी है।

हिंदी का वैश्विक विस्तार भी उल्लेखनीय है। भारत से बाहर बसे प्रवासी भारतीयों ने हिंदी को नई जमीन दी है। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, त्रिनिदाद-टोबैगो, नेपाल, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हिंदी न केवल बोली जाती है, बल्कि स्कूलों, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक केंद्रों में पढ़ाई भी जाती है। विश्व के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी विभाग स्थापित हैं, जहाँ हिंदी भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति पर शोध हो रहा है। यह हिंदी की वैश्विक स्वीकार्यता का जीवंत प्रमाण है।

विश्व हिंदी दिवस का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य नई पीढ़ी को हिंदी से जोड़ना भी है। आज अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव के बीच कई बार हिंदी को पिछड़ेपन की भाषा समझ लिया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि हिंदी में वही सामर्थ्य है जो किसी भी वैश्विक भाषा में है। आवश्यकता केवल सोच बदलने की है। यदि बच्चे हिंदी में गर्व से बोलें, लिखें और सोचें, तो वे अपनी जड़ों से जुड़े रहेंगे और आत्मविश्वास के साथ दुनिया का सामना कर पाएँगे। शिक्षा व्यवस्था में हिंदी माध्यम को आधुनिक तकनीक और नवाचार से जोड़कर इसे और प्रभावी बनाया जा सकता है।

हिंदी केवल भारत की भाषा नहीं, बल्कि मानवता की साझा धरोहर बनती जा रही है। इसकी सरलता, भावनात्मक गहराई और अभिव्यक्ति की सहजता इसे विशेष बनाती है। हिंदी में संवाद करना केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का माध्यम है। यही कारण है कि हिंदी फिल्मों, गीतों और नाटकों के माध्यम से भी दुनिया भर में लोगों के दिलों तक पहुँची है। बॉलीवुड और भारतीय संगीत ने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय मंच पर लोकप्रिय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

विश्व हिंदी दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम हिंदी का सम्मान केवल समारोहों तक सीमित न रखें, बल्कि इसे अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएँ। दफ्तरों में, स्कूलों में, घरों में और डिजिटल दुनिया में हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग करें। हिंदी में सोचें, हिंदी में लिखें और हिंदी में गर्व महसूस करें। साथ ही, अन्य भाषाओं का सम्मान करते हुए बहुभाषिक संस्कृति को अपनाएँ, क्योंकि विविधता ही भारत की शक्ति है।

अंततः, विश्व हिंदी दिवस केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि एक सतत अभियान है—हिंदी को सशक्त बनाने का, इसे आधुनिक बनाने का और इसे विश्व की अग्रणी भाषाओं की पंक्ति में और आगे ले जाने का। आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी यह प्रण लें कि हम हिंदी को केवल विरासत नहीं, बल्कि भविष्य की भाषा बनाएँगे। हिंदी हमारी पहचान है, हमारा स्वाभिमान है और हमारी सांस्कृतिक आत्मा है—इसे संजोना, संवारना और आगे बढ़ाना हम सबका दायित्व है।



पद्मदेव सिंह (पीडी सिंह)

चन्द्रशेखर नगर, बलिया (उ.प्र.)




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