फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाने वाली रंगभरी एकादशी भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का एक अत्यंत पावन एवं आनंदमयी पर्व है। यह दिन विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के प्रेम, उल्लास और भक्ति भाव को समर्पित होता है। यही वह शुभ अवसर है जब होली के रंगों का विधिवत शुभारंभ होता है और ब्रजभूमि भक्ति, संगीत व रंगों में सराबोर हो उठती है।
रंगभरी एकादशी का सबसे भव्य और अलौकिक स्वरूप वृंदावन और बरसाना में देखने को मिलता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण राधारानी के साथ बरसाना से वृंदावन पधारते हैं और प्रेम व आनंद के रंगों से ब्रज को रंग देते हैं। इसी परंपरा के कारण इस एकादशी को “रंगभरी” कहा जाता है।
इस पावन दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और शोभायात्राओं का आयोजन होता है। श्रीकृष्ण और राधा के विग्रहों को गुलाल, अबीर और फूलों से सजाया जाता है। भक्त एक-दूसरे को रंग लगाकर प्रेम, सौहार्द और भाईचारे का संदेश देते हैं। यह पर्व केवल रंगों का नहीं, बल्कि अहंकार, द्वेष और नकारात्मकता को त्याग कर जीवन में प्रेम और सकारात्मकता भरने का प्रतीक है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रंगभरी एकादशी का व्रत रखने से भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन किया गया दान-पुण्य और भक्ति कार्य अनेक गुना फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु उपवास रखकर भगवान का स्मरण करते हैं, कथा-श्रवण करते हैं और राधा-कृष्ण के प्रेम लीला का गुणगान करते हैं।
आज के समय में भी रंगभरी एकादशी हमें यह संदेश देती है कि जीवन केवल संघर्षों का नाम नहीं, बल्कि प्रेम, उल्लास और रंगों से भरा उत्सव है। यह पर्व समाज में सौहार्द, समरसता और आपसी प्रेम को मजबूत करता है तथा होली जैसे महापर्व के लिए मन और वातावरण दोनों को तैयार करता है।
निःसंदेह, रंगभरी एकादशी भक्ति और आनंद का वह दिव्य संगम है, जहां रंग केवल बाहरी नहीं होते, बल्कि मन और आत्मा को भी प्रेम और विश्वास के रंगों से भर देते हैं।
परिवर्तन चक्र समाचार सेवा ✍️


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