तीन युवा परिंदे उड़े आसमान रो पड़ा, वो हंस रहे थे मगर हिन्दुस्तान रो पड़ा...

जिए तो खूब जिए और मरे तो खूब मरे महा विदाई पर सतलुज का श्मशान रो पड़ा। गर्दनों के गुलाबों ने किया माँ का अभिषेक, ओज भरी कुर्बानी पर सारा जहान रो पड़ा*.।.....

भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु दिलों में हैं... 23 मार्च को अखिल भारत महान रो पड़ा।

आज से 9 दशक पहले 23 मार्च के ही के दिन मां भारती को ब्रितानिया हुकूमत से मुक्त कराने के लिये शंखनाद करने वाले रण बांकुरों को फांसी पर लटका दिया गया। गजब‌ का जज्बा दिल में लिये मौत को करीब से देखने के बाद भी माये रंग दे बसन्ती चोला की गीत गाते वन्दे मातरम् के उद्घोष के साथ एक आवाज एक सिंहनाद के साथ मुस्कराते हुये जीवन के आखरी सफर पर निकल पड़े। शत शत हुतात्मा सेनानियों के पावन रक्त से अभिसीन्चित मां भारती के जर्रा जर्रा से आज भी वह आवाज परवाज़ चढ रही है जिसको अमर बलिदानियों ने मौत को गले लगाते समय बेखौफ मुस्कराते हुते गाया था। आजाद भारत में शहादत की इबादत में पहली बार शहीद स्मारको पर सरकारी ब्यवस्था में आस्था के साथ श्रद्धा सुमन अर्पित किया जा रहा है। जालियांवाला बाग कांड को देखकर बदला लेने कि कसम खाने वाला मां भारती का अमर सपूत उधम सिह ने 23 मार्च 1940 को आताताई के घर में घुस कर गोलियों से छलनी कर दिया। मां भारती के सपूतो के शौर्य को देखकर थरथरा उठी अंग्रेजी हुकूमत आज भी इन शेरों की बहादूरी का बखान करने से नहीं अघाती लेकीन इस देश के परिवेश में सियासत की लमेरा पैदावार ने राष्ट्र रत्न कि उपाधि अंग्रेजों के दलालों में बांट कर शहादत का खुला मजाक उड़ाया है। सुभाषचन्द्र बोस युद्ध बन्दी घोषित कर दिये गये, देश की शान चन्दशेखर आजाद आतंकी कहे जाने लगे, भगत सिह‌ को सिरफिरा कहकर दोगले सियासत बाज तुष्टीकरण को बढ़ाने में आत्म सम्मान समझते रहे। देश की अजीम विरासत सियासत की भेंट चढ़ गयी। 70 साल तक खेल होता रहा धरती कुड़ती रही आसमान रोता रहा। आजादी के परवानो का सपना चकनाचूर हो गया गद्दारों का कारनामा मशहूर हो गया। सब कुछ गंवा कर आजादी दीवाने को इतिहास‌ के पन्नो में कोई जगह नही, बल्कि जगह उनको मिल गयी गुड़गांन उनका हुआ जिनके कारण ही रणबांकुरों को बलिदान होना पडा। मिल गयी आजादी बिना खड्ग बिना ढाल साबरमती के लाल तूने कर दिया कमाल। वाह साहब गजब की चाटुकारिता‌  इतिहास‌ के पन्नों में समाहित कर दिया गया। अपमानित होकर रह‌गया शहादत का कारनामा।

आखिर 1857 से लेकर 1947 तक के बिप्लव कारी संघर्षों का लम्बा सफर गुमनाम क्यों कर दिया गया। झांसी की रानी को बलिदान क्यों होना पडा 1857 में मंगल पांडे को फासी क्यों दी गयी महाराणा प्रताप को घास की रोटी क्यों खानी पड़ी सुभाषचन्द्र बोष ‌को देश क्यों छोड़ना पडा भगत सिंह को फांसी पर क्यों झूलना पड़ा आजाद की शहादत इस धरती मां ने क्यों लिया, लाखो लाख नौजवानों का बलिदान क्यों हुआ, क्या इस सवाल का ज़बाब गद्दार इतिहास कारों  सियासतदारों के पास है। आजादी की शहजादी की रिहाई देश का स्वभिनान आजाद, भगत सिह, सहित लाखों के बलिदान से मिला है न कि अहिंसा के आन्दोलन से। आज जागरुक समाज सच के सतह पर पहुंच कर असलियत को उजागर कर रहा हे। गद्दार ग्वालियर नरेश के खानदान को सत्तर साल तक सियासी हुक्मरान ताज पोशी करते कराते रहे हैं। आज वक्त माकूल ज़बाब दे रहा है। उपेक्षित हो चुके शहीदों की शहादत पर सरकार का जागरुकता कार्यक्रम नोजवानो मे राष्ट्री भक्ति का अलख जगा रहा है। आजादी महानायकों को शत शत नमन बिनम्र श्रद्धा सुमन अर्पित है। स्नेह और सम्मान में अश्कों की लड़ी समर्पित है। तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहे न रहे।

जयहिंद🌹🌹🙏🏻🙏🏻


जगदीश सिंह, मऊ

मो0-7860503468

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