यूपी : क्या विधानसभा चुनाव के लिए प्रसपा का सपा में होगा विलय? शिवपाल यादव ने दिया बड़ा बयान

लखनऊ: प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (प्रसपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने कहा कि साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए प्रसपा का समाजवादी पार्टी में विलय नहीं होगा, बल्कि छोटी-छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ेंगे. उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव द्वारा मुझे एक सीट या फिर कैबिनेट मंत्री पद देना एक मजाक है.

शिवपाल ने गुरुवार को लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस कर कहा कि समाजवादी धारा के सभी लोग एक मंच पर आएं और एक ऐसा तालमेल बने, जिसमें सभी को सम्मान मिल सके. उन्होंने कहा, "जहां तक समाजवादी पार्टी का प्रश्न है, अब तक मेरे इस आग्रह पर पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई है और न ही इस विषय पर मेरी समाजवादी पार्टी के नेतृत्व से कोई बात हुई है. प्रसपा का स्वतंत्र अस्तित्व बना रहेगा और पार्टी विलय जैसे एकाकी विचार को एक सिरे से खारिज करती है. पार्टी अपने पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को यह विश्वास दिलाती है कि उनके सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा. मैं एक बार फिर गैर भाजपा दलों की एकजुटता का आह्वान करता हूं."

प्रसपा अध्यक्ष ने बताया कि 21 दिसंबर को मेरठ के सिवाल खास विधानसभा क्षेत्र में वह रैली करेंगे. इसके बाद 23 दिसंबर को इटावा के हैवरा ब्लॉक में चौधरी चरण सिंह के जन्मदिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन होगा. इसके बाद 24 दिसंबर से गांव-गांव की पदयात्रा की जाएगी, जो कि अगले छह महीने तक चलेगी. उन्होंने बताया कि इसके लिए प्रचार रथ तैयार किया जा रहा है.

शिवपाल यादव ने कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों का समर्थन किया और कहा कि कृषि विरोधी बिल के खिलाफ दिल्ली आ रहे पंजाब व हरियाणा के किसानों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने से रोका जा रहा है. कड़ाके की सर्दी के बावजूद उन पर पानी की बौछार की जा रही है, आंसूगैस व लाठियां चलाई जा रही हैं. उन्होंने कहा, "अन्नदाताओं पर ऐसा अमानवीय अत्याचार करने वालों को सत्ता में बने रहने का अधिकार नहीं है. लोकतंत्र में सांकेतिक विरोध प्रदर्शन का अधिकार सभी को है. यही लोकतंत्र की ताकत है. बड़ी सी बड़ी समस्याओं को बातचीत के द्वारा हल किया जा सकता है. जन आकांक्षा के दमन और लाठीचार्ज के लिए लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है."

शिवपाल ने कहा कि भाजपा सरकार में सबसे परेशान किसान हैं. उन्हें फसल का लागत मूल्य भी नहीं मिल रहा है. पिछले साल जो धान 2400 रुपये क्विंटल बिका था, वह इस बार 1100 से 1300 रुपये के बीच बिक रहा है. गन्ने का समर्थन मूल्य पिछले कई सालों से एक रुपया भी नहीं बढ़ाया गया है और अभी तक पिछले साल के गन्ना मूल्य का भुगतान नहीं हुआ है.





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