विश्व मृदा दिवस पर विशेष-

 

विश्व मृदा दिवस पर बलिया जनपद में मृदा संसाधन की उपादेयता, मिट्टी के प्रकार, बनावट, विशेषताओं आदि का उल्लेख करते हुए वर्तमान समय में आधुनिक कृषि का मिट्टी की उर्वरता पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की उल्लेख करते हुए अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दुबेछपरा, बलिया के पूर्व प्राचार्य पर्यावरणविद् डा० गणेश कुमार पाठक ने एक विशेष भेंटवार्ता में बताया कि मानव जीवन एवं उसकी विकसित आर्थिक क्रियाओं से मिट्टी का घनिष्टतम् संबंध है। अतः किसी भी क्षेत्र के आर्थिक विकास हेतु मिट्टी आधारभूत संसाधन है। बलिया जनपद के लिए तो मिट्टी की उपादेयता और अधिक है, क्योंकि यहाँ की 73.29 प्रतिशत भूमि पर कृषि की जाती है और कृषि का मूलाधार मिट्टी ही है।

बलिया जनपद के सम्पूर्ण क्षेत्र में गंगा, घाघरा एवं उनकी सहायक नदियों द्वारा हिमालय के मुलायम शैलों से अनाच्छादित कर लाए गये जलोढ़ मिट्टी का जमाव है, जो अत्यन्त गहराई तक हुआ है। साथ ही साथ यत्र - तत्र बुन्देलखण्ड के ट्रैप शैलों से प्राप्त आग्नेय शैलों के जलोढ़ का भी जमाव काली मिट्टी के रूप में मिलता है। 

मृदा विज्ञान के अनुसार बलिया जनपद के मिट्टी को दो मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है-

1. खादर मिट्टी

2. बाँगर मिट्टी

जबकि संरचना के अनुसार बलिया जनपद की मिट्टी को छः भागों में विभक्त किया गया है-

 1. बलुई मिट्टी

2. बलुई टोमट मिट्टी

3. चिकनी बलुई दोमट मिट्टी

4. दोमट मिट्टी

5. चिकनी मिट्टी 

6. क्षारीय लवणयुक्त मिट्टी

 उपर्युक्त मिट्टियों में सामान्य रासायनिक तत्वों के साथ निर्माण प्रक्रिया एवं स्थानीय भू- आकृतियों के प्रभाव से कुछ क्षेत्रीय विशेषताओं का भी समावेश हो गया है ,जिसके आधार पर बलिया जनपद की मिट्टी को वास्तव में निम्नांकित वर्गों में बाँटा जा सकता है-

मिट्टी के प्रकार क्षेत्रफल (किमी०मे)

1.खादर मिट्टी 875.8

2.पार खादर मिट्टी 540.9

3.उच्चभूमि दोमट 257.9

4.धनखर मिट्टी। 1167.9

5.करईल मिट्टी। 185.9

क्षारीय लवणयुक्त 154.9

यद्यपि कि बलिया की मिट्टी अति उपजाऊ है, किन्तु हरित क्रांति आंदोलन के बाद जिस गति से मिट्टी में कृषि उपज बढ़ाने हेतु रासायनिक उर्धरकों एवं कीटनाशकों का प्रयोग करते हुए एवं मशीनीकरण का प्रयोग करते हुए आधुनिक कृषि को बढ़ावा दिया गया, उससे कृषि उपज में तो बेतहाशा वृद्धि हुई , किन्तु कालान्तर में धीरे- धीरे मिट्टी की उर्वरता कम होने लगी और मिट्टी अनुपजाऊ होने लगी है। लिहाज अधिक उपज प्राप्त करने हेतु अब पहले से भी ज्यादा उर्वरक का प्रयोग करना पड़ रहा है जो अति घातक सिद्ध हो रहा है। आधुनिक कृषि के तहत उर्वरकों के प्रयोग पर 365 जिलों में किए गये अध्ययन से यह तथ्य सामने आया है कि मात्र 18 जिलों में ही नाईट्रोजन की मात्रा अच्छी है, 119 जिलों में नाईट्रोजन की मात्रा मध्यम है, जबकि 228 जिलों में नाईट्रोजन की मात्रा कम है। इसी तरह 46 प्रतिशत जिलों में फास्फोरस कम है, जबि 52 प्रतिशत जिलों में मध्यम है। 20 प्रतिशत जिलों में पोटैशियम कम है, जबकि 42 प्रतिशत जिलों में मध्यम है। इस प्रकार स्पष्ट है कि इन रासायनिक उर्वरकों द्वारा मिट्टी के पोषक तत्वों को निचोड़ लिया जाता है और मिट्टी धीरे- धीरे बंजर भूमि में बदलने लगती है।

 यही नहीं जिन क्षेत्रों में गहन कृषि की जा रही है , वहाँ की भूमि में एन पी सहित कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं सल्फर जैसे दोयम पोषक तत्वों तथा मैगनीज, लोहा, तांबा, जिंक, बोरीन और मालीब्डेनम आदि तत्वों में कमी होती जा रही है,जिसका मिट्टी की उर्वरता पर भयंकर दूरगामी परिणाम होगा।

मिट्टी की उर्वरता कायम रहे और अधिक पैदावार भी हो, इसका एकमात्र उपाय जैविक विधि से खेती करना है ,जिसमें जैविक बीजों एवं जैविक खादों का प्रयोग किया जाय। साथ ही साथ आधुनिक एवं परम्परागत खेती की विधियों में समन्वय स्थापित कर खेती की जाय ताकि मिट्टी की उर्वरता बनी रहे। अंधाधुंध बिना सोचे- समझे , बिना मिट्टी का परीक्षण कराए रासायनिक उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग अंततः हानिकारक ही सिद्ध होगा।



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