एक स्वर, एक भाव, एक भारत : ‘नमामि भारतम्’ में गूंजेगा वंदे मातरम्


25 सितंबर को सामूहिक गायन के ऐतिहासिक अवसर पर विशेष

भारत की आत्मा उसकी विविधता में बसती है और उसकी शक्ति उस एकता में, जो अलग-अलग भाषाओं, संस्कृतियों और परंपराओं को एक सूत्र में पिरोती है। इसी राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाला ‘वंदे मातरम्’ भारतीय इतिहास का ऐसा कालजयी गीत है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में देशवासियों के भीतर मातृभूमि के प्रति समर्पण और स्वाभिमान की भावना को प्रखर किया। इसके 150वें वर्ष के पावन अवसर पर 25 सितंबर को आयोजित ‘नमामि भारतम्’ सामूहिक गायन इसी गौरवशाली विरासत के प्रति सामूहिक नमन का ऐतिहासिक अवसर है।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ‘वंदे मातरम्’ समय की सीमाओं से परे जाकर भारतीय जनमानस का हिस्सा बन गई। स्वतंत्रता संग्राम के कठिन दौर में इसके स्वर लोगों में उत्साह, साहस और राष्ट्रीय चेतना का संचार करते थे। आज जब देश इसके 150वें वर्ष का स्मरण कर रहा है, तब यह अवसर इतिहास के उन पन्नों को फिर से जीवंत करने के साथ नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विरासत से जोड़ने का भी माध्यम बन रहा है।

25 सितंबर का दिन इस भावना को सामूहिक स्वर देने जा रहा है। ‘नमामि भारतम्’ के तहत जब बड़ी संख्या में लोग एक साथ ‘वंदे मातरम्’ का गायन करेंगे, तब अलग-अलग कंठों से निकली ध्वनियां एक ही भाव में विलीन होंगी। यह दृश्य भारत की उस जीवंत तस्वीर को सामने रखेगा, जिसमें विविधता के बावजूद राष्ट्रभाव की डोर सबको जोड़ती है।

यह आयोजन केवल एक सामूहिक गायन तक सीमित नहीं है। इसके पीछे उस इतिहास को स्मरण करने की भावना है, जिसमें अनगिनत लोगों ने स्वतंत्रता और राष्ट्र की गरिमा के लिए संघर्ष किया। उनके त्याग और संघर्ष ने देश को स्वतंत्रता की राह दिखाई। ‘वंदे मातरम्’ उन भावनाओं का भी स्मरण कराता है, जिनमें मातृभूमि के प्रति सम्मान, आत्मगौरव और राष्ट्र के लिए समर्पण का भाव निहित रहा है।

आज की पीढ़ी के लिए ऐसे अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि तेजी से बदलती दुनिया में अपनी जड़ों और विरासत से जुड़ाव समाज को अपनी पहचान का बोध कराता है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विभिन्न संस्थानों में होने वाला सामूहिक गायन बच्चों और युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से परिचित कराने के साथ उनमें जिम्मेदार नागरिक होने की भावना को भी मजबूत कर सकता है।

‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष का उत्सव अतीत के गौरव को याद करने के साथ भविष्य के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देता है। राष्ट्र के प्रति सम्मान केवल किसी गीत के गायन तक सीमित नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों के निर्वहन, सामाजिक सद्भाव, अनुशासन, ईमानदारी और देश की प्रगति में अपने हिस्से का योगदान देने में भी अभिव्यक्त होता है।

25 सितंबर को ‘नमामि भारतम्’ के अवसर पर उठने वाला सामूहिक स्वर इसी व्यापक भावना का प्रतीक बनेगा। यह स्वर इतिहास की स्मृतियों को वर्तमान की चेतना से जोड़ेगा और आने वाली पीढ़ी को अपनी विरासत के प्रति जागरूक करेगा। जब हजारों-लाखों कंठ एक साथ मातृभूमि का वंदन करेंगे, तब यह केवल गीत नहीं रहेगा, बल्कि भारत की साझा चेतना का सजीव उत्सव बन जाएगा।

वंदे मातरम् के 150वें वर्ष का यह अवसर हमें अपनी गौरवशाली विरासत को स्मरण करने, स्वतंत्रता के लिए किए गए संघर्षों को नमन करने और राष्ट्र की एकता, सद्भाव तथा प्रगति के प्रति अपने दायित्व को समझने की प्रेरणा देता है। ‘नमामि भारतम्’ इसी भाव को जन-जन तक पहुंचाने वाला एक स्मरणीय अध्याय बने—जहां स्वर अनेक हों, लेकिन भाव एक हो; पहचान अनेक हों, लेकिन राष्ट्र एक हो।

वंदे मातरम्!

आशीष त्रिवेदी ✍️

सचिव, संकल्प संस्था, बलिया