पैटन टैंकों के आगे चट्टान बनकर खड़े हुए थे शहीद अब्दुल हमीद

 

1965 के भारत-पाक युद्ध में अदम्य साहस से दुश्मन के टैंकों को किया था ध्वस्त, परमवीर चक्र से हुए सम्मानित

10 सितंबर : पुण्यतिथि विशेष

भारतीय सैन्य इतिहास में कुछ वीर सपूत ऐसे हैं, जिनका नाम देश की आने वाली पीढ़ियों के लिए साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन जाता है। परमवीर चक्र से सम्मानित शहीद अब्दुल हमीद उन्हीं महान योद्धाओं में से एक हैं। 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान उन्होंने जिस अदम्य साहस, असाधारण वीरता और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, वह भारतीय सैन्य इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय है। 10 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि पर पूरा देश उस वीर जवान को श्रद्धापूर्वक नमन करता है, जिसने मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया।

शहीद अब्दुल हमीद का जन्म 1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में हुआ था। साधारण परिवार में जन्मे अब्दुल हमीद के भीतर बचपन से ही साहस, अनुशासन और देश के प्रति समर्पण की भावना थी। उन्होंने भारतीय सेना में भर्ती होकर अपने जीवन को राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया। सेना में रहते हुए उन्होंने कठिन प्रशिक्षण प्राप्त किया और अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ किया। उनकी कर्तव्यपरायणता और बहादुरी ने उन्हें अपने साथियों के बीच विशेष पहचान दिलाई।

वर्ष 1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ा, तब देश की सीमाओं पर भारतीय जवानों ने अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन किया। इसी युद्ध में अब्दुल हमीद ने ऐसी वीरता दिखाई, जिसने दुश्मन की मजबूत सैन्य शक्ति को भी चुनौती दे दी। उस समय पाकिस्तान के पास अमेरिकी निर्मित अत्याधुनिक पैटन टैंक बड़ी संख्या में थे। इन टैंकों को भारतीय सैनिकों के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा था। लेकिन अब्दुल हमीद ने अपने अदम्य साहस और असाधारण युद्ध कौशल के बल पर दुश्मन के टैंकों का मुकाबला किया।

कहा जाता है कि 8 सितंबर 1965 को खेमकरण क्षेत्र के असल उत्तर में हुई निर्णायक लड़ाई के दौरान अब्दुल हमीद ने अपनी जीप पर लगी रिकॉयलेस गन के माध्यम से दुश्मन के कई टैंकों को निशाना बनाया। भारी गोलाबारी और जान के खतरे के बावजूद वे पीछे नहीं हटे। उन्होंने अपनी स्थिति को लगातार बदलते हुए दुश्मन के टैंकों पर सटीक प्रहार किए। उनके इस साहस ने न केवल भारतीय सैनिकों का मनोबल बढ़ाया, बल्कि पाकिस्तानी सेना को भी भारी नुकसान पहुंचाया।

अब्दुल हमीद की वीरता का सबसे प्रेरणादायक पक्ष यह था कि उन्होंने अत्यंत विषम परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ा। उनके सामने दुश्मन के भारी-भरकम टैंक थे, जबकि उनके पास अपेक्षाकृत हल्का हथियार और सीमित संसाधन थे। फिर भी उन्होंने अपनी सूझबूझ, साहस और युद्धकौशल से असंभव दिखाई देने वाली चुनौती को संभव कर दिखाया। उनके शौर्य ने यह साबित किया कि युद्ध केवल हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि सैनिक के साहस, संकल्प और राष्ट्र के प्रति समर्पण से भी जीता जाता है।

10 सितंबर 1965 को वीर अब्दुल हमीद युद्धभूमि में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। उनका सर्वोच्च बलिदान देश की स्मृति में सदैव अमर रहेगा। उनकी असाधारण वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया। परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य वीरता पुरस्कार है और यह सम्मान अब्दुल हमीद के अद्वितीय शौर्य की महानता को दर्शाता है।

शहीद अब्दुल हमीद की कहानी केवल एक सैनिक की बहादुरी की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भारत की कहानी है, जहां देश की रक्षा के लिए जवान अपनी जान की परवाह किए बिना सीमा पर डटे रहते हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि मातृभूमि के प्रति सच्ची निष्ठा शब्दों से नहीं, बल्कि कर्म और त्याग से साबित होती है। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण तक देश की रक्षा का दायित्व निभाया और अपने प्राणों की आहुति देकर भारत की वीरता की परंपरा को और गौरवशाली बनाया।

आज जब हम आधुनिक भारत की मजबूत सैन्य शक्ति और सीमाओं की सुरक्षा की बात करते हैं, तो हमें उन वीर जवानों को भी याद करना चाहिए, जिन्होंने कठिन दौर में अपने साहस और बलिदान से देश की रक्षा की। अब्दुल हमीद जैसे वीरों की गाथाएं नई पीढ़ी को राष्ट्रप्रेम, अनुशासन, साहस और जिम्मेदारी का संदेश देती हैं। उनकी वीरता यह प्रेरणा देती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ संकल्प और साहस के सामने बड़ी से बड़ी चुनौती भी छोटी पड़ सकती है।

शहीद अब्दुल हमीद की पुण्यतिथि केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेने का दिन भी है। देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इस महान योद्धा को राष्ट्र हमेशा गर्व और सम्मान के साथ याद करता रहेगा। उनकी वीरगाथा भारतीय इतिहास के पन्नों में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगी।

शहीद अब्दुल हमीद को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन। उनका अदम्य साहस, त्याग और राष्ट्रप्रेम आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करता रहेगा।

पंडित विजेंद्र शर्मा ✍️

बलिया (उ.प्र.)