कजरी तीज हिंदू धर्म और भारतीय लोकसंस्कृति का एक महत्वपूर्ण एवं पावन पर्व है। यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के लिए आस्था, श्रद्धा, प्रेम, सौभाग्य और पारिवारिक सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। सावन की हरियाली और भादों की उमंग के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व भारतीय परंपराओं की उस खूबसूरत विरासत को जीवंत करता है, जिसमें धार्मिक आस्था के साथ लोकगीत, झूले, श्रृंगार और पारिवारिक रिश्तों की मिठास भी देखने को मिलती है। कजरी तीज को कई स्थानों पर ‘बड़ी तीज’ के नाम से भी जाना जाता है और उत्तर भारत, विशेषकर उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तथा राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में इसे विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है।
कजरी तीज का पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के प्रेम, समर्पण और दांपत्य जीवन की पवित्रता से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी इसी अटूट श्रद्धा और तपस्या के फलस्वरूप भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया। इसलिए विवाहित महिलाएं इस दिन अपने पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए व्रत एवं पूजा करती हैं। वहीं अविवाहित युवतियां भी मनोवांछित वर की प्राप्ति और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से इस पर्व को श्रद्धापूर्वक मनाती हैं।
कजरी तीज की सुबह से ही घरों में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिलता है। महिलाएं स्नान आदि के बाद नए अथवा पारंपरिक परिधान धारण करती हैं और हाथों में मेहंदी लगाकर सोलह श्रृंगार करती हैं। हरी चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, महावर और पारंपरिक आभूषण महिलाओं के श्रृंगार को और आकर्षक बना देते हैं। पूजा के दौरान माता पार्वती और भगवान शिव का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। कई स्थानों पर महिलाएं समूह में एकत्र होकर तीज की कथा सुनती हैं और भजन-कीर्तन करती हैं।
कजरी तीज की सबसे बड़ी विशेषता इसकी लोक परंपरा है। इस अवसर पर गांवों और कस्बों में झूले पड़ते हैं और महिलाएं तथा युवतियां झूला झूलते हुए कजरी गीत गाती हैं। कजरी गीत पूर्वांचल और उत्तर भारत की समृद्ध लोक-संस्कृति की पहचान हैं। इन गीतों में प्रेम, विरह, सावन की हरियाली, मायके की याद, पति के प्रति स्नेह और प्रकृति के सौंदर्य का मनोहारी चित्रण मिलता है। ढोलक की थाप और लोकगीतों की मधुर धुन वातावरण में उल्लास भर देती है।
विशेष रूप से पूर्वांचल की धरती पर कजरी तीज का अपना अलग सांस्कृतिक महत्व है। यहां कजरी केवल एक गीत नहीं, बल्कि लोकजीवन की भावनाओं की अभिव्यक्ति है। सावन-भादों के मौसम में जब खेत-खलिहान हरियाली से भर जाते हैं और चारों ओर बारिश की फुहारें प्रकृति को नया रूप देती हैं, तब कजरी गीतों की गूंज वातावरण को और भी मनमोहक बना देती है। कजरी तीज के अवसर पर महिलाएं अपनी सहेलियों और परिवार की महिलाओं के साथ मिलकर पारंपरिक गीत गाती हैं और पर्व की खुशियां साझा करती हैं।
इस पर्व से जुड़ी एक सुंदर परंपरा मायके और ससुराल के रिश्तों की मिठास को भी दर्शाती है। तीज के अवसर पर बेटियों को मायके से श्रृंगार सामग्री, वस्त्र, मिठाई, फल तथा अन्य उपहार भेजने की परंपरा रही है। इससे बेटी और मायके के बीच भावनात्मक संबंध और मजबूत होते हैं। आधुनिक जीवनशैली के बावजूद आज भी अनेक परिवार इस परंपरा को पूरी श्रद्धा और आत्मीयता के साथ निभाते हैं।
कजरी तीज केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय नारी के त्याग, प्रेम, धैर्य और पारिवारिक समर्पण का भी प्रतीक है। हालांकि बदलते समय के साथ पर्व मनाने के तरीकों में बदलाव आया है, लेकिन इसकी मूल भावना आज भी वही है—परिवार में प्रेम, सौहार्द, सुख और समृद्धि की कामना। यह पर्व हमें अपनी जड़ों, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है।
कजरी तीज प्रकृति और मानव जीवन के बीच गहरे संबंध का भी संदेश देती है। बारिश के मौसम में चारों ओर फैली हरियाली, पेड़-पौधों पर झूले, मिट्टी की सोंधी खुशबू और लोकगीतों की मधुरता इस पर्व को प्रकृति के उत्सव में बदल देती है। यह अवसर हमें पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशील होने की प्रेरणा भी देता है। हमारी लोक परंपराओं में प्रकृति को सदैव सम्मान दिया गया है और कजरी तीज इसका सुंदर उदाहरण है।
आज के आधुनिक और व्यस्त जीवन में ऐसे पर्वों की महत्ता और भी बढ़ जाती है। ये त्योहार परिवार के सदस्यों को एक साथ आने, पुरानी परंपराओं को याद करने और नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति से परिचित कराने का अवसर देते हैं। बच्चों और युवाओं को कजरी गीतों, लोक परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं से जोड़ना हमारी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
कजरी तीज का संदेश केवल व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है। यह प्रेम में विश्वास, रिश्तों में सम्मान, परिवार में सौहार्द और जीवन में सकारात्मकता का संदेश देती है। भगवान शिव और माता पार्वती का दांपत्य जीवन पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास, समानता और समर्पण का आदर्श प्रस्तुत करता है। ऐसे में यह पर्व आज भी पारिवारिक जीवन को मजबूत बनाने और रिश्तों की अहमियत समझने की प्रेरणा देता है।
कजरी तीज के पावन अवसर पर चारों ओर खुशियों और उमंग का वातावरण दिखाई देता है। महिलाएं श्रद्धा के साथ व्रत रखती हैं, पूजा-अर्चना करती हैं और अपने परिवार की खुशहाली की प्रार्थना करती हैं। वहीं लोकगीतों और पारंपरिक आयोजनों के माध्यम से हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत जीवंत हो उठती है। वास्तव में कजरी तीज भारतीय संस्कृति की उस सुंदर तस्वीर का नाम है, जिसमें आस्था के साथ प्रेम है, परंपरा के साथ उल्लास है और धार्मिक भावना के साथ लोकजीवन की मधुरता है।
कजरी तीज का यह पावन पर्व सभी के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और खुशहाली लेकर आए। परिवारों में प्रेम और सौहार्द बना रहे, दांपत्य जीवन सुखमय हो और हमारी लोक परंपराओं की यह समृद्ध विरासत आने वाली पीढ़ियों तक इसी तरह जीवंत बनी रहे—यही इस पावन पर्व की सबसे सुंदर कामना है।
परिवर्तन चक्र समाचार सेवा ✍️

