हिंदू धर्म में काल भैरव जयंती का विशेष महत्व है। यह पावन पर्व भगवान काल भैरव की जयंती के रूप में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। काल भैरव को भगवान भगवान शिव का उग्र और शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है, जो समय (काल) के स्वामी और न्याय के रक्षक हैं। हर वर्ष यह पर्व भक्तों को आस्था, अनुशासन और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, काल भैरव का प्राकट्य अधर्म और अन्याय के विनाश के लिए हुआ था। उन्हें काशी (वाराणसी) का कोतवाल भी कहा जाता है, जो वहां के रक्षक माने जाते हैं। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से काल भैरव की पूजा करता है, उसके जीवन से भय, संकट और नकारात्मक शक्तियां दूर हो जाती हैं।
काल भैरव जयंती के दिन भक्त सुबह स्नान कर व्रत रखते हैं और मंदिरों में जाकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं। विशेष रूप से काल भैरव को सरसों का तेल, काला तिल, नारियल, फूल और प्रसाद अर्पित किया जाता है। इस दिन काल भैरव अष्टक का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। कई स्थानों पर भैरव बाबा को मदिरा और उड़द के पकवान भी चढ़ाने की परंपरा है, जो उनकी विशेष पूजा विधि का हिस्सा मानी जाती है।
इस दिन रात्रि जागरण और भजन-कीर्तन का भी आयोजन होता है। श्रद्धालु पूरी रात भगवान भैरव का स्मरण करते हैं और उनसे अपने जीवन की समस्याओं से मुक्ति तथा सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से शनि और राहु-केतु के अशुभ प्रभाव भी कम होते हैं।
काल भैरव जयंती केवल पूजा-अर्चना का ही पर्व नहीं है, बल्कि यह आत्मसंयम, समय के महत्व और जीवन में अनुशासन बनाए रखने का संदेश भी देता है। काल भैरव को समय का नियंत्रक माना जाता है, इसलिए यह दिन हमें अपने समय का सदुपयोग करने और गलत कार्यों से दूर रहने की प्रेरणा देता है।
आज के आधुनिक जीवन में, जहां व्यक्ति तनाव, भय और असुरक्षा से घिरा रहता है, काल भैरव की उपासना उसे मानसिक शांति और आत्मबल प्रदान करती है। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि सत्य और न्याय के मार्ग पर चलकर ही जीवन में स्थायी सुख प्राप्त किया जा सकता है।
अंततः, काल भैरव जयंती आस्था, शक्ति और संरक्षण का प्रतीक है। यह दिन हमें अपने भीतर की नकारात्मकताओं को त्यागकर सकारात्मकता अपनाने और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देता है। भगवान काल भैरव की कृपा से सभी के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास हो—इसी कामना के साथ यह पावन पर्व मनाया जाता है।
धीरेन्द्र प्रताप सिंह ✍️सहतवार, बलिया (उ.प्र.)



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