सत्तू की ठंडक, परंपरा की मिठास — सतुआन का अनमोल लोकपर्व


भारतीय लोकजीवन में अनेक ऐसे पर्व हैं, जो केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि प्रकृति, स्वास्थ्य और सामाजिक समरसता का संदेश भी देते हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण लोकपर्व है सतुआन, जो प्रतिवर्ष 14 अप्रैल को उत्तर भारत सहित देश के विभिन्न हिस्सों में बड़े श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और मिथिलांचल क्षेत्र में अत्यधिक लोकप्रिय है, जहां इसे परंपराओं और लोकमान्यताओं के साथ मनाने की समृद्ध परंपरा रही है।

सतुआन पर्व का मूल आधार सादगी और स्वास्थ्य है। इस दिन लोग मुख्य रूप से सत्तू का सेवन करते हैं, जो भूने हुए चने और जौ से तैयार किया जाता है। सत्तू एक ऐसा आहार है, जिसे बनाने में किसी प्रकार के चूल्हे या जटिल प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं होती। केवल पानी मिलाकर इसे तुरंत तैयार किया जा सकता है। यही कारण है कि यह पर्व गर्मी के मौसम की शुरुआत में शरीर को ठंडक और ऊर्जा प्रदान करने के उद्देश्य से मनाया जाता है।

आयुर्वेदिक दृष्टि से भी सत्तू अत्यंत लाभकारी माना जाता है। यह शरीर को ठंडा रखने, पाचन शक्ति को मजबूत करने और लू से बचाव करने में सहायक होता है। गर्मी के दिनों में सत्तू का घोल पीना एक प्राकृतिक उपाय है, जो शरीर को ताजगी और स्फूर्ति प्रदान करता है। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सत्तू को ‘गरीबों का प्रोटीन’ कहा जाता है, क्योंकि यह सस्ता होने के साथ-साथ पौष्टिक भी है।

सतुआन पर्व केवल खानपान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी गहरी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं भी हैं। इस दिन लोग सुबह स्नान कर सूर्य देवता की पूजा करते हैं और सत्तू, गुड़ तथा कच्चे आम (कैरी) से बने व्यंजन अर्पित करते हैं। घरों में मिट्टी या पीतल के घड़े में आम के पल्लव रखकर पूजा की जाती है। इसके साथ ही पेड़ों में जल अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है, जो प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण का संदेश देती है।

यह पर्व विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। मिथिलांचल में इसे जुड़शीतल, हिमाचल प्रदेश में सतुवानी और असम में सत्यवान के रूप में मनाया जाता है। हालांकि नाम भिन्न हो सकते हैं, लेकिन इसके पीछे का भाव एक ही है—प्रकृति के साथ सामंजस्य और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता।

वर्तमान समय में जब फास्ट फूड और आधुनिक खानपान की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा है, ऐसे में सतुआन पर्व हमें अपनी पारंपरिक और स्वास्थ्यवर्धक खाद्य संस्कृति की याद दिलाता है। सत्तू न केवल जल्दी बनने वाला और सस्ता भोजन है, बल्कि यह शरीर को आवश्यक पोषक तत्व भी प्रदान करता है। यह आधुनिक जीवनशैली में भी उतना ही उपयोगी है, जितना कि पारंपरिक जीवन में था।

सामाजिक दृष्टि से भी यह पर्व लोगों को एक साथ जोड़ने का कार्य करता है। इस दिन लोग अपने परिवार और समुदाय के साथ सत्तू और अन्य पारंपरिक व्यंजनों का आनंद लेते हैं, जिससे आपसी प्रेम और भाईचारा मजबूत होता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सादगी में भी आनंद और संतोष पाया जा सकता है।

अंततः, सतुआन केवल एक पर्व नहीं, बल्कि एक जीवनशैली का प्रतीक है—जो सादगी, स्वास्थ्य, प्रकृति और परंपरा के संतुलन को दर्शाता है। आज के दौर में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, जब हमें अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के प्रति सजग रहने की आवश्यकता है। सतुआन हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने और प्राकृतिक जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा देता है।

धीरेन्द्र प्रताप सिंह ✍️ 

सहतवार, बलिया (उ.प्र.)



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