सतुआन : सत्तू की सादगी, आस्था की परंपरा और सेहत का अनुपम लोकपर्व


उत्तर भारत सहित देश के कई प्रदेशों में प्रतिवर्ष 14 अप्रैल को मनाया जाने वाला लोक पर्व सतुआन अपनी सादगी, परंपरा और स्वास्थ्यवर्धक महत्व के कारण विशेष पहचान रखता है। यह पर्व न केवल सांस्कृतिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि भारतीय जीवनशैली की सहजता और प्रकृति के अनुरूप खानपान का भी प्रतीक है। भूने चने और जौ से तैयार किया जाने वाला सत्तू ऐसा खाद्य पदार्थ है, जिसे बनाने के लिए न चूल्हे की आवश्यकता होती है और न ही बर्तनों का झंझट। केवल पानी मिलाकर इसे आसानी से तैयार किया जा सकता है, यहां तक कि कपड़े पर गूंथकर भी इसका सेवन संभव है।

शिक्षक/साहित्यकार डॉ. नवचंद्र तिवारी के अनुसार सत्तू एक ऐसा आहार है, जिसे लोग भोजन और पेय दोनों रूपों में ग्रहण करते हैं। विशेषकर भीषण गर्मी और लू के दौरान सत्तू का घोल शरीर को ठंडक और ऊर्जा प्रदान करता है, जिससे यह एक प्रकार से प्राकृतिक “रामबाण” सिद्ध होता है। यही कारण है कि आधुनिक समय में भी इसकी उपयोगिता बनी हुई है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इसकी महत्ता को समझते हुए वन डिस्ट्रिक्ट वन फूड (ओडीओएफ) योजना के अंतर्गत बलिया जिले के प्रमुख खाद्य पदार्थ के रूप में सत्तू को मान्यता प्रदान की है। अब यह सुविधा पैकेटबंद रूप में डाकघरों तक में उपलब्ध हो रही है, जिससे इसकी पहुंच और अधिक बढ़ गई है। साथ ही, बलिया का प्रसिद्ध लिट्टी-चोखा भी सत्तू के महत्व को और रेखांकित करता है।

आज की नई पीढ़ी जहां मैगी जैसे त्वरित खाद्य पदार्थों को आसान विकल्प मानती है, वहीं सत्तू उससे भी अधिक सरल, सस्ता और पौष्टिक विकल्प है। यह न केवल तुरंत तैयार हो जाता है, बल्कि शरीर को आवश्यक पोषण भी प्रदान करता है।

सतुआन पर्व का संबंध पौराणिक मान्यताओं से भी जुड़ा हुआ है। जनश्रुति के अनुसार इस दिन पेड़ों में बासी जल अर्पित करने की परंपरा है। घरों में पूजा के दौरान मिट्टी या पीतल के घड़े में आम के पल्लव रखे जाते हैं और सत्तू व गुड़ से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके साथ कच्चे आम (कैरी) की चटनी या सत्तू का घोल सूर्य देवता को अर्पित किया जाता है। पूजा के पश्चात सत्तू और आम को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

यह पर्व विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से प्रसिद्ध है—मिथिलांचल में जुड़शीतल, हिमाचल प्रदेश में सतुवानी और असम में सत्यवान के नाम से जाना जाता है। इसकी खास बात यह है कि समाज के हर वर्ग—गरीब से लेकर अमीर तक—सभी लोग सत्तू का सेवन बड़े ही चाव से करते हैं।

सतुआन पर्व हमें यह संदेश देता है कि पारंपरिक आहार और लोक परंपराएं न केवल हमारी संस्कृति की पहचान हैं, बल्कि स्वास्थ्य और संतुलित जीवनशैली का भी आधार हैं। आज के आधुनिक युग में सत्तू जैसे प्राकृतिक और सरल खाद्य पदार्थों को अपनाना ही सच्चे अर्थों में अपनी जड़ों से जुड़ना है।



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