रामनवमी के पावन अवसर पर जब हम भगवान श्रीराम का स्मरण करते हैं, तो यह केवल एक धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, मर्यादा, आदर्श जीवन और मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना का अवसर भी होता है। ‘राम’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण पद्धति, एक दर्शन और एक उच्चतम आदर्श का प्रतीक हैं।
इतिहास और शास्त्रों के अनुसार, ‘श्रीराम’ नाम के व्यापक रूप से प्रचलित होने से पहले उन्हें ‘दशरथ राघव’ या ‘राघव’ के नाम से संबोधित किया जाता था। उन्हें भगवान विष्णु का मानव अवतार माना गया है। कहा जाता है कि उनके भीतर दिव्यता की 16 कलाएं समाहित थीं, जिनमें से प्रारंभिक अवस्था में 12 या 14 कलाओं का उल्लेख मिलता है, जो समय के साथ पूर्णता को प्राप्त हुईं। इन्हीं दिव्य गुणों और उत्कृष्ट आचरण के कारण उन्हें ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ की उपाधि मिली।
वाल्मीकि रामायण एवं रामचरितमानस जैसे महान ग्रंथों में वर्णित श्रीराम के 16 गुण उन्हें एक आदर्श मानव और श्रेष्ठ शासक के रूप में स्थापित करते हैं। ये गुण हैं—गुणवान, सत्यनिष्ठ, कृतज्ञ, धैर्यवान, दृढ़प्रतिज्ञ, सदाचारी, रक्षक, विद्वान, संयमी, क्रोध विजेता, कांतिमय, साहसी, पराक्रमी और करुणामय। इन गुणों के कारण ही श्रीराम न केवल एक आदर्श पुत्र, भाई, पति और मित्र बने, बल्कि एक आदर्श राजा के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए।
श्रीराम का जीवन ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना का साकार रूप है। उन्होंने उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक भारत को एकता के सूत्र में पिरोया। उनका व्यक्तित्व जाति, धर्म, वर्ग और संकीर्णताओं से परे है। वे सभी के लिए समान रूप से आदर्श और पूज्य हैं। उनके शासनकाल ‘रामराज्य’ में न्याय, समृद्धि और समानता का सर्वोच्च आदर्श स्थापित हुआ।
वर्तमान समय में जब समाज नैतिक पतन, सामाजिक विघटन और सांस्कृतिक संकट का सामना कर रहा है, तब श्रीराम के आदर्श और अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उनके जीवन से हमें सत्य, धर्म, संयम, कर्तव्यनिष्ठा और त्याग का संदेश मिलता है। यदि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में आत्मसात करें, तो न केवल व्यक्तिगत जीवन में संतुलन आएगा, बल्कि समाज और राष्ट्र भी सशक्त एवं समृद्ध बनेगा।
राम केवल आस्था नहीं, बल्कि आचरण हैं। वे केवल पूजनीय नहीं, बल्कि अनुकरणीय हैं। श्रीराम भारतीय संस्कृति के शाश्वत आधार हैं और युगों-युगों तक मानवता को मार्गदर्शन देते रहेंगे।
✍️ डॉ० गणेश पाठकपूर्व प्राचार्य एवं पूर्व शैक्षिक निदेशक
जननायक चन्द्रशेखर विश्वविद्यालय, बलिया।



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