भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में भगवान महावीर का स्थान अत्यंत ऊँचा और प्रेरणादायक है। महावीर जयंती जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाती है। यह पर्व न केवल जैन समुदाय के लिए, बल्कि संपूर्ण मानव समाज के लिए अहिंसा, सत्य, त्याग और आत्मसंयम का संदेश लेकर आता है।
भगवान महावीर का जन्म ईसा से लगभग 599 वर्ष पूर्व वैशाली के कुंडलपुर में हुआ था। उनके बचपन का नाम वर्धमान था। बचपन से ही वे अत्यंत गंभीर, शांत और करुणामय स्वभाव के थे। उन्होंने सांसारिक सुखों का त्याग कर 30 वर्ष की आयु में दीक्षा ग्रहण की और कठोर तपस्या के बाद उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके पश्चात उन्होंने अपना जीवन मानवता के कल्याण और सत्य के प्रचार-प्रसार में समर्पित कर दिया।
महावीर जयंती का पर्व हमें उनके द्वारा दिए गए पाँच प्रमुख सिद्धांतों—अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (अधिक संचय न करना)—की याद दिलाता है। इन सिद्धांतों का पालन करके व्यक्ति न केवल अपने जीवन को सरल और शांत बना सकता है, बल्कि समाज में भी प्रेम, सौहार्द और समानता स्थापित कर सकता है।
इस दिन मंदिरों में भगवान महावीर की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। उनके जीवन से जुड़े प्रसंगों का पाठ किया जाता है और भव्य शोभायात्राएँ निकाली जाती हैं। श्रद्धालु दान-पुण्य करते हैं तथा जरूरतमंदों की सहायता कर उनके आदर्शों को आत्मसात करने का प्रयास करते हैं। कई स्थानों पर प्रवचन, भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।
महावीर जयंती केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का अवसर भी है। वर्तमान समय में जब समाज हिंसा, तनाव और भौतिकता की ओर बढ़ रहा है, तब भगवान महावीर के उपदेश हमें संयम, सहिष्णुता और शांति का मार्ग दिखाते हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि महावीर जयंती हमें यह प्रेरणा देती है कि हम अपने जीवन में अहिंसा और सत्य को अपनाकर एक बेहतर समाज के निर्माण में योगदान दें। भगवान महावीर के आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने हजारों वर्ष पहले थे, और उनका संदेश सदैव मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा।
निर्भय नारायण सिंह एडवोकेट ✍️पूर्व अध्यक्ष, फौजदारी अधिवक्ता संघ, बलिया (उ.प्र.)



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